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धर्मग्रन्थ | Dharm Granth

जिन पुस्तकों से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो, उन्हें धर्मग्रन्थ कहते हैं ।

संसार के धर्मग्रन्थ

सभी ग्रन्थों का ज्ञान मोह (तत्व) तक ही सीमित है, एक शब्द भी पार नहीं जाता । ऐसे ग्रन्थों में खोज-खोज कर लोग बार-बार संशय में ही पड़ते हैं ।1

दीपक रूपी ज्ञान (संसार के धर्मग्रन्थों) को लेकर, न तो वे (संसार के जीव) अन्धकार (माया) का रहस्य समझ सके, न ही अपने मूल स्वरूप तक पहुंच पाए । दीपक की ज्योति यहां क्या करेगी, यहां तो चौदह तबक अन्धकार (अज्ञानता) में डूबे हैं ।2

निगम (वैदिक साहित्य) में परब्रह्म के विषय में नेति-नेति (यह नहीं-यह नहीं) कहा गया है । उसमें निराकार मण्डल से आगे की सुध नहीं है ।3

धर्मग्रन्थों के अर्थ महामती जी ने खोले

(श्री राज ने इन्द्रावती जी को दर्शन देते समय कहा था-) संसार में जो कोई धर्मग्रन्थ हैं, किसी ने कभी उसके अर्थ नहीं समझे । अब सुहागनियों (ब्रह्मसृष्टियों) की खातिर तू उनके अर्थ करेगी ।4



(1) कलस हिन्दुस्तानी 2/35 (2) कलस हि. 1/23 (3) कलस हि. 1/27 (4) कलस हि. 9/37