Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

परब्रह्म या परमेश्वर

सच्चिदानन्द परब्रह्म की महिमा अनन्त है । उनके दिव्य स्वरूप में तेज, ज्ञान, सौन्दर्य, प्रेम, बल, कृपा, आनन्द, आदि के अनन्त सागर विद्यमान हैं । परमात्मा अजर, अमर हैं । वे अनादि काल से हैं और अनन्त काल तक इसी प्रकार रहेंगे । उनकी शक्ति से ही यह ब्रह्माण्ड चलता है । वे ईश्वरों के ईश्वर हैं और सभी देवी-देवताओं के पूज्य हैं ।

परमात्मा एक है

परमात्मा तो एक ही है, परन्तु मनुष्य उसे अनेक नामों से पुकारते हैं, जैसे- परब्रह्म, सच्चिदानन्द, अक्षरातीत, पुरुषोत्तम, प्राणनाथ, ईश्वर, अल्लाह, खुदा, गॉड, इत्यादि ।

धाम

वस्तुतः परमात्मा इस संसार में नहीं है । वह इस जगत से परे अपने दिव्य धाम में रहता है, जहां कोई जीव नहीं पहुंच सकता । उसके धाम को हम अलग-अलग नामों से पुकारते हैं, जैसे- परमधाम, ब्रह्मपुरी, अर्श, हैवन, इत्यादि ।

लीला

परब्रह्म अपने दिव्य धाम में अपनी आत्माओं के साथ प्रेम और आनन्द की लीला करते हैं । अक्षर से परे विराजमान होने के कारण उन्हें अक्षरातीत भी कहते हैं ।

उनके सत् अंग अक्षर भी उन्हीं के समान अजर और अमर हैं, और इच्छा मात्र से एक क्षण में करोड़ों क्षर (नश्वर) ब्रह्माण्ड बनाते और मिटाते हैं ।

इस क्षर जगत के जीव अक्षर के विषय में ही बहुत कम जानते हैं, तो भला अक्षरातीत को कौन जानता होगा ।

संसार में आगमन

अनेक ग्रन्थों में परमात्मा के कलियुग में संसार में आने की भविष्यवाणी लिखी हुई है, परन्तु यह नश्वर ब्रह्माण्ड दिव्य धाम के एक कण का तेज सहन नहीं कर सकता तो साक्षात् अक्षरातीत के आने पर यह कैसे टिक सकेगा । फिर भी अनहोनी घटना के रूप में, अपनी आत्माओं को यह नश्वर दुःख का ब्रह्माण्ड दिखाने के उद्देश्य से, अक्षरातीत का संसार में प्रकटन हुआ । अपने दिव्य अलौकिक स्वरूप की बजाय अपने आवेश (शक्ति) स्वरूप से परब्रह्म ने नश्वर जगत में पदार्पण किया और प्राणनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

संसार में आगमन का मुख्य कारण था- परब्रह्म और उनकी आत्माओं के बीच हुआ इश्क रब्द (प्रेम विवाद) । वैसे तो परब्रह्म का संसार में दो बार आगमन हुआ, परन्तु उनकी ब्रह्मलीला को तीन भाग में बांटा जा सकता है-

  1. ब्रज लीला
  2. रास लीला
  3. जागनी लीला

परब्रह्म के प्रति हमारा कर्त्तव्य

हर मानव का यह कर्त्तव्य है कि वह परमात्मा सम्बन्धित ब्रह्मज्ञान को ढूंढकर ग्रहण करे और परब्रह्म पर अपना पूर्ण समर्पण करे ।

वस्तुतः अनेक ग्रन्थों में परमात्मा के बारे में संकेत में वर्णन है, परन्तु विस्तृत वर्णन तो सिर्फ कुलजम सरूप में ही किया गया है ।