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विषय-सूची

द्वैत

द्वैत का अभिप्राय दो से है । इस नश्वर संसार में जीव और प्रकृति के बीच द्वैत का खेल चलता रहता है ।

अद्वैत (ब्रह्म) के आड़े द्वैत है । यह सब (जगत) द्वैत का ही विस्तार है । किसी ने भी द्वैत को छोड़कर आगे के वचन निश्चित रूप से नहीं कहे ।1



(1) कलस हिन्दुस्तानी 2/16