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ज्ञान | Jnan

ज्ञान का अर्थ होता है- बोध, जानकारी या विद्या । संसार में बहुत तरह का ज्ञान उपलब्ध है, परन्तु ब्रह्मज्ञान को सर्वश्रेष्ठ मानना चाहिए क्योंकि उससे परब्रह्म अक्षरातीत को जानकर मुक्ति पायी जा सकती है ।

क्या संसार के ज्ञान से परब्रह्म मिल सकते हैं?

दीपक रूपी ज्ञान (संसार के धर्मग्रन्थों) को लेकर, न तो वे (संसार के जीव) अन्धकार (माया) का रहस्य समझ सके, न ही अपने मूल स्वरूप तक पहुंच पाए । दीपक की ज्योति यहां क्या करेगी, यहां तो चौदह तबक अन्धकार (अज्ञानता) में डूबे हैं ।1

निगम (वैदिक साहित्य) में परब्रह्म के विषय में नेति-नेति (यह नहीं-यह नहीं) कहा गया है । उसमें निराकार मण्डल से आगे की सुध नहीं है ।2

यहां परब्रह्म का मार्ग दिखाने वाले कई पन्थ (सम्प्रदाय) और पैंड़ें (प्रथाएं) चलते हैं, जिनके अलग-अलग भेष और दर्शन (सिद्धान्त) हैं । इनके ज्ञान से भी कोई इस अंधेरी (अज्ञानमयी संसार) से निकल नहीं पाता है ।3

यहां जैसे-जैसे परब्रह्म को खोजिए, तैसे-तैसे बंध (संशय) पड़ते जाते हैं । यदि कई प्रयास किए जाएं, तो भी तिमर (अज्ञानता का अन्धकार) छोड़ता नहीं है ।4

त्रैगुण (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) इस खेल के स्वामी हैं । मैं समझती थी कि इनके ज्ञान से आवागमन से मुक्ति मिल जाएगी । मैंने यह अच्छी तरह जान लिया कि ये भी अभी अन्धकार (अज्ञान) में हैं ।5

महामती जी ने सत्य ज्ञान जाहिर किया

अब मैं असत्य (संसार) के ज्ञान को दूर करती हूं और सत्य (परब्रह्म) के ज्ञान को जाहिर करती हूं । जो बात इतने दिन तक गोपनीय रही थी, सो अब प्रकाशित होती है ।6

सत्य (परब्रह्म) के ज्ञान को फैलाकर असत्य (नश्वर संसार) को अखण्ड भी करना है, इसलिए सब सनन्ध (वास्तविकता) समझाकर सम्पूर्ण तिमर (अज्ञान) का नाश करूंगी ।7



(1) कलस हिन्दुस्तानी 1/23 (2) कलस हि. 1/27 (3) कलस हि. 1/29 (4) कलस हि. 1/30 (5) कलस हि. 1/33 (6) कलस हि. 21/8 (7) कलस हि. 21/9