Kuljam.org

विषय-सूची

ज्ञानी | Jnani

ज्ञानी उसे कहते हैं, जिसे ज्ञान हो । ज्ञानी व्यक्ति के लिए विद्वान और पण्डित जैसी उपमाओं का भी प्रयोग किया जाता है ।

संसार के विद्वानों की स्थिति

यहां (संसार में) कई सूरमाओं (ज्ञानियों) ने टोप (ज्ञान), शस्त्र (साधना) और कवच (संयम) धारण करके माया से युद्ध किया । रण में बड़े वचन बोल कर वे भी अन्त में हार गए ।1

साधु (ज्ञानी) वेद, वेदान्त और शास्त्रों का ज्ञान लेकर दौड़ते हैं, परन्तु मोह (माया) उन्हें आगे नहीं जाने देता ।2

वे एक क्षण तो कहते हैं कि सब ब्रह्म है, दूसरे क्षण उसे (संसार को) बांझ स्त्री के पुत्र के समान (अस्तित्वहीन) कहते हैं । नशे में डूबे बन्दर की जैसी स्थिति होती है, वैसे ही ये लोग अनेक बातें करते हैं ।3

वे एक क्षण तो कहते हैं कि सत (ब्रह्म) से असत (संसार) बना है, फिर कह देते हैं कि माया तो कुछ है ही नहीं । इनकी संगति से संशय बढ़ता है और सब धोखे में भटकते रहते हैं ।4

वे एक क्षण कहेंगे कि (ब्रह्म) आप में है, दूसरे क्षण कहेंगे कि बाहर है । तीसरे क्षण कहेंगे कि न अन्दर है, न बाहर है । इनके शब्दों में कोई स्थिरता नहीं है ।5

जैसे बावरा (नासमझ) बालक खेलते समय कभी हंसता है, तो कभी रोने लगता है, वैसे ही शास्त्र के विषय में साधु (विद्वान) के शब्द दृढ़ नहीं हैं ।6

जो लोग बड़ी बुद्धि वाले कहलाते हैं, वे भी इस प्रकार ठण्डे पड़ गए । उन्हें छल (संसार) और वतन (धाम) की पहचान न हो सकी, सो वे शून्य (निराकार) में गल गए ।7

ज्ञानी और प्रेमी में अन्तर

प्रेमी तो निश्चित रूप से छिपे रहते हैं । उनके मुख से बोला भी नहीं जाता । यदि उनके मुख से कोई शब्द निकलता भी है, तो कोई ज्ञानी उसका अर्थ नहीं समझा सकता ।8



(1) कलस हिन्दुस्तानी 1/31 (2) कलस हि. 2/24 (3) कलस हि. 2/26 (4) कलस हि. 2/27 (5) कलस हि. 2/28 (6) कलस हि. 2/30 (7) कलस हि. 2/38 (8) कलस हि. 2/45