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विषय-सूची

अक्षर

जो क्षर (नश्वर) नहीं है, उसे अक्षर कहते हैं । अक्षर का अर्थ होता है अनश्वर, अर्थात् जो कभी नष्ट नहीं होता । इसके अन्तर्गत उत्पत्ति तो सम्भव है, परन्तु विनाश सम्भव नहीं है ।

स्वामी

अक्षर पुरुष को ब्रह्म, अक्षर, नूरजलाल, आदि नामों से भी जाना जाता है और वे ही अक्षर ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं ।

अक्षरातीत और अक्षर अद्वैत स्वरूप हैं ।

सृष्टि

अक्षर की सृष्टि को ईश्वरी सृष्टि (आत्मा) कहते हैं । इसके अतिरिक्त अक्षर की पांच वासनाएं भी हैं, जो क्षर जगत में अक्षर का ज्ञान संकेत में देती हैं ।

लीला

अक्षर की लीला बाल स्वभाव वाली है और उनकी इच्छा ही मूल प्रकृति है ।1

उनके नैन के इशारे से चौथाई पल में कई करोड़ ब्रह्माण्ड उत्पन्न और नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तीन लोकों वाला यह खेल पैदा होता है ।2

इस प्रकार आप (अक्षर) अपनी इच्छानुसार प्रकृति से कई विध से खेलते हैं ।3

स्थान

इस नश्वर जगत से परे अक्षर ब्रह्माण्ड स्थित है, जो अखण्ड और प्रकाशमयी है । इसे योगमाया या बेहद भी कहते हैं ।



(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/15 (2) प्रकास हि. 37/16 (3) प्रकास हि. 37/17