योगमाया या बेहद | Yogmaya or Behad
क्षर ब्रह्माण्ड से परे जो नित्य अक्षर ब्रह्माण्ड है, उसे योगमाया या बेहद कहते हैं । यहां पर पुरुष अक्षर हैं और योगमाया उनकी प्रकृति है । कालमाया के विपरीत, योगमाया सत्य, चेतन और अखण्ड है । इस ब्रह्माण्ड में एक बार जो बन जाए, वह कभी मिटता नहीं । इसी ब्रह्माण्ड में पहुंचने पर जीव को अखण्ड मुक्ति मिल सकती है ।
योगमाया में सब कुछ जाग्रत है । वहां के जल, जमीन, वायु, अग्नि, आदि तत्व तथा स्थिर व चर प्राणी, पशु, पक्षी, आदि सब कुछ चेतन हैं ।1
उस (योगमाया की) जमीन के एक जरा से कण के आगे यहां के करोड़ों सूर्यों का तेज भी दृष्टि में नहीं आएगा (फीका लगेगा) ।2
यदि मैं (योगमाया के) वन को स्वर्ण व जवेर (रत्नों) से बना हुआ कहूं, तो ये सब तो झूठी (स्वप्नमयी, नश्वर) वस्तुएं हैं । उस अविनाशी भूमि की शोभा का वर्णन मुख (वाणी) या हाथ (लेखन) से नहीं किया जा सकता ।3
वहां का चन्द्रमा, वन, पशु, पक्षी और सभी तत्व सुतेज (प्रकाशवान्) हैं । जो कुछ भी स्थिर या चलायमान है, सब सुतेज हैं । वहां का कण-कण सुतेज है ।4
इस ब्रह्माण्ड के चार मण्डल हैं, जो अक्षर ब्रह्म के अन्तःकरण का प्रतीक हैं-
- सत स्वरूप (अहं)
- केवल (बुद्धि)
- सबलिक (चित्त)
- अव्याकृत (मन)
सत्स्वरूप
यह अक्षर के अहं का स्वरूप है । यहीं पर ईश्वरी सृष्टि का मूल स्थान है ।
केवल
यह अक्षर की बुद्धि का स्वरूप है । यहीं पर बनाए गए रास मण्डल में रास लीला हुई थी । तद्पश्चात् वह लीला सबलिक के महाकारण में अखण्ड हुई ।
सबलिक
यह अक्षर के चित्त का स्वरूप है और आदिनारायण की परात्म का मूल स्थान है।
ब्रज और रास दोनों ब्रह्माण्ड में हुई ब्रह्म लीला अखण्ड हो गयी । अक्षर के चित्त (सबलिक) में ऐसा हुआ तो उसका नाम सदाशिव कहा गया ।5
सबलिक के कारण में ब्रज की लीला अखण्ड है और सबलिक के महाकारण में रास की लीला अखण्ड है ।
अव्याकृत
यह अक्षर के मन का स्वरूप है और इसकी प्रेरणा से क्षर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है ।
(1) कलस हिन्दुस्तानी 20/17 (2) कलस हि. 20/18 (3) कलस हि. 20/19 (4) कलस हि. 20/21 (5) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/49
