अक्षरातीत
जो अक्षर से भी परे है, उसे अक्षरातीत कहते हैं । अक्षरातीत ही परब्रह्म हैं और सबके पूज्य हैं ।
यहां (क्षर ब्रह्माण्ड) से परे एक ही पुरुष प्रियतम (अक्षरातीत) हैं, दूसरा कोई नहीं है ।1
निवास
धाम की अखण्ड भूमिका जहां न कुछ उत्पन्न होता है, न कुछ नष्ट होता है, सदैव एक समान रहता है, वही अक्षरातीत का स्थान है । अक्षर की लीला अक्षर ब्रह्माण्ड में होती है, परन्तु उनका मूल स्वरूप भी अक्षरातीत के साथ धाम में विराजमान है ।
संसार में अक्षरातीत कहां रहते हैं ?
जब तक प्रियतम की सुधि नहीं थी, तब तक (गुप्त रूप से) सुहागन के अंग (हृदय) में ही प्रियतम थे ।2
स्वामी
अक्षरातीत धाम के स्वामी हैं और परब्रह्म, सच्चिदानन्द, नूरजमाल, अल्लाह, पूर्णब्रह्म, परमात्मा, प्राणनाथ, राज, आदि विशेषणों से उन्हें सम्बोधित किया जाता है ।
सृष्टि
अक्षरातीत की सृष्टि को ब्रह्मसृष्टि, आत्मा या सखियां कहते हैं ।
लीला
अक्षरातीत अपनी आत्माओं के साथ धाम में प्रेम और आनन्द की लीला करते हैं ।
(1) कलस हिन्दुस्तानी 12/2 (2) कलस हि. 11/17
