चितवन
युगल स्वरूप श्री राज श्यामा जी के स्वरूप और निजधाम का ध्यान करने को चितवन कहते हैं । वस्तुतः चितवन का शाब्दिक अर्थ होता है देखना ।
इश्क का यह लक्षण है कि (विरहणी) अपने नैनों पर पलक नहीं झपकाती । वह (चितवन से) दौड़ लगाती रहती है । तब भी (साक्षात्कार) न मिल सके, तो अपनी अन्तर्दृष्टि (आत्मिक दृष्टि) को पिया में लगाए रखती है ।1
(1) कलस हिन्दुस्तानी 7/9
