परमधाम
वह स्थान जहां परब्रह्म अपनी आत्माओं के साथ निवास करते हैं, धाम कहलाता है । वह स्थान क्षर और अक्षर से परे स्थित है, जहां स्वप्न के जीव प्रवेश नहीं कर सकते । श्री धाम को अक्षरातीत धाम, ब्रह्मपुरी, अर्श, लाहूत, निजधाम, वतन, परमधाम आदि नामों से भी जाना जाता है ।
हमारे आड़े चौदे तबक (लोक) और मोह तत्व या निराकार-निरंजन है । हमें इसके पार पहुंचना है । इसके पार पिया का वतन (धाम) है ।1
अब यह कितने प्रकार से कहूं । निजधाम की लीला में नित्य बड़ा विहार होता है । अक्षरातीत किशोर (प्रेम) लीला करते हैं, जिसका बहुत अधिक सुख सखियां लेती हैं ।2
धाम की लीला का बहुत विस्तार है । वहां महलों और मन्दिरों (कमरों) का अन्त नहीं है । इस घर (के निवासी) के अतिरिक्त आज तक इस लीला का किसी को ज्ञान नहीं था ।3
(1) कलस हिन्दुस्तानी 4/16 (2) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/76 (3) प्रकास हि. 37/77
