हुकम
परब्रह्म के आदेश के बिना कुछ नहीं होता । उनके आदेश को ही हुकम या हुक्म कहते हैं ।
महामती कहती हैं कि खसम के हुकम के बिना कोई यहां (धाम में) नहीं आ सकता ।1
हुकम की शोभा इन्द्रावती जी को मिली
(प्रियतम ने) अपना अंग, (धाम की) बुद्धि और आवेश (शक्ति) देकर मुझ (इन्द्रावती) से कहा- तू मुझे प्यारी है । तुझे हुकम करता हूं कि सब (ब्रह्मसृष्टियों) को (जागनी का) सुख दो ।2
मेरे हुकम के प्रताप से चौदह लोक (के जीव) एक (मत) हो जाएंगे । यह शोभा तुझ सुहागन (इन्द्रावती) को मिलेगी । अपने को मुझसे जुदा मत समझना ।3
ब्रह्मसृष्टियों के लिए श्री राज का हुकम
जो हुकम को शिरोधार्य करके अपने अंग को मरोड़कर (माया की निद्रा को त्यागकर) नहीं उठी, तो प्रियतम और सैयां सब देख रहे हैं कि तुम्हारे प्रेम में कितना बल है ।4
(1) कलस हिन्दुस्तानी 4/18 (2) कलस हि. 9/30 (3) कलस हि. 9/36 (4) कलस हि. 11/25
