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विषय-सूची

इन्द्रावती

धाम में एक ब्रह्मसृष्टि है, उसका नाम इन्द्रावती है । (वे कहती हैं) प्रियतम ने मुझ पर प्रसन्न होकर धाम के मूल वचन (श्री कुलजम सरूप) मुझे सौंप दिए ।1

आदि से लेकर आज तक द्वार (धाम के रहस्य) कभी नहीं खुले । हमारे बिना ऐसा कोई नहीं हुआ जो उसे खोल सके । सो (प्रियतम ने) मेरे हाथ में कुञ्जी (तारतम ज्ञान) दी है और (कहते हैं) तू अपने साथ के कारण इसे खोल दे ।2

हम सबका ताप (दुःख) मिटाने के लिए (प्रियतम ने) मुझे अपने समान बना दिया । मेरी आत्मा को जाग्रत बुद्धि मिल गई और मुझे सपने से जगाकर सुध (पहचान) दे दी ।3

मैं (इन्द्रावती) अबला अर्धांगिनी हूं, प्रियतम (श्री राज) की प्यारी नारी हूं । सभी सुहागनियों को जगाऊं, तो मुझे सन्तोष होगा ।4

इन्द्रावती जी को महामति कहलाने की शोभा मिली है । उनके दिल में बैठकर अक्षरातीत प्राणनाथ ने लीला करी ।

जामनगर में इन्द्रावती जी को श्री राज का दर्शन हुआ

(प्रियतम ने) छल (माया) से मुझे छुड़ाकर कुछ विरह दे दिया । फिर अपना अंग (साक्षात्कार) देकर उस विरह को भी छुड़ा दिया ।5

जब (विरह की) आह शरीर में सूख गई और श्वांस ने भी साथ छोड़ दिया (प्राण छूट गए), तब तुमने पर्दा (माया) टालकर मुझे अपना अंग (साक्षात्कार) दिया ।6

इस प्रकार तुम (श्री राज) ने मुझ (इन्द्रावती) को अपनी अंगना जानकर (दर्शन) दिया । निश्चित रूप से बीच का परदा (अहं की बाधा) हटाने के लिए ही विरह दिया था ।7

(श्री राज ने) मुझे युक्ति से (हब्शा भेजकर) जगाया और अपने स्वरूप (साक्षात्कार) का सुख दिया । उन्होंने कण्ठ से कण्ठ लगाया (एकाकार किया) । इस प्रकार मुझसे मिलाप किया ।8

तुम्हारे आने (साक्षात्कार) से सब कुछ (निधि) आ गया और (विरह का) सब दुःख दूर हो गया । महामती कहती है कि मेरे अन्दर जो मूल (धाम) का अंकुर जाग्रत हुआ है, उसका सुख कैसे कहूं ।9

प्रियतम जो पार (योगमाया) के पार (धाम में) हैं, उन्होंने स्वयं धाम के द्वार मेरे लिए खोले । जब उन्होंने द्वार खोलकर दिखाया, तब मैंने पार (धाम) का दर्शन किया ।10

(प्रियतम ने) धाम की सब बात कही, सो मैंने धाम को प्रत्यक्ष देखा । मेरे ज्ञान में पूर्ण रूप से दृढ़ता आ गई और अनुमान लगाना बन्द हो गया।11

मैंने अपने आप (परात्म) को पहचाना और (श्री राज से) अखण्ड सम्बन्ध का बोध हुआ । इस मेहेर को कहा नहीं जा सकता । मुझे प्रारम्भ से लेकर अब तक की सब बातों की सुध हो गई ।12

साक्षात्कार के दौरान श्री राज और इन्द्रावती जी की वार्ता

(प्रियतम ने) अपना अंग, (धाम की) बुद्धि और आवेश (शक्ति) देकर मुझ (इन्द्रावती) से कहा-13

"तू मुझे प्यारी है । तुझे हुकम करता हूं कि सब (ब्रह्मसृष्टियों) को (जागनी का) सुख दो । सुहागनियां (ब्रह्मसृष्टियां) संसार में दुःखी हो रही हैं, यह मुझसे सहा नहीं जाता । मैं भी जाहिर हो जाऊंगा, परन्तु अभी तुम सुहागनियों को जगाओ । इस (हुकम) को शिरोधार्य करके तुम खड़ी रहो (जागनी करो) । सब सैयों (सखियों) को पूरी बात कहना । अपने मन में दृढ़ करके देखो कि (ज्ञान का) प्रकाश तुझ से होगा ।

"तुझसे कुछ अन्तर नहीं है, तू सुहागन नारी है । सत शब्दों (ब्रह्मज्ञान के रहस्यों) के अर्थ और पार (धाम) के द्वार तू खोलेगी । अनादि काल से अब तक जो (तारतम ज्ञान) कभी (किसी ब्रह्माण्ड में) जाहेर नहीं हुआ, तुझे उसकी सुध होगी और निज बुद्धि से वह जाहेर होगा । तुझे सब बातें सूझेंगी (समझ आएंगी) और मैं निश्चित रूप से कहता हूं कि तू कहीं अटकेगी नहीं । मेरे हुकम के कारण तुझे पार (योगमाया) के पार (अक्षर धाम) के पार (निज धाम) का ज्ञान होगा ।

"मेरे हुकम के प्रताप से चौदह लोक (के जीव) एक (मत) हो जाएंगे । यह शोभा तुझ सुहागन (इन्द्रावती) को मिलेगी । अपने को मुझसे जुदा मत समझना । संसार में जो कोई धर्मग्रन्थ हैं, किसी ने कभी उसके अर्थ नहीं समझे । अब सुहागनियों (ब्रह्मसृष्टियों) की खातिर तू उनके अर्थ करेगी ।

"हे महामत ! तू अपने दिल में विचार करके देख । (तेरे ज्ञान से) सब असत्य (अज्ञान) उड़ जाएगा । सबको सुख देने के लिए तू जाहेर हुई है । पहले सुहागनियों (ब्रह्मसृष्टियों) को सुख मिलेगा । इसके पश्चात् संसार (जीवों) को सुख मिलेगा । सब एक रस हो जाएंगे और घर-घर में अपार सुख होगा ।

"तू सुहागनियों से कहना कि यह खेल (संसार) किस कारण बना है । पहले उन्हें खेल दिखाकर, बाद में मूल घर (धाम) चलेंगे । जो इस घर (धाम) की सैयां (सखियां) हैं, उनसे कोई बात मत छिपाना । आखिर (योगमाया में होने वाली लीला) में तो चौदह लोक (समस्त जीवों) में यह बातें जाहिर हो जाएंगी ।

"तुमने मुख से जो वचन (कुलजम सरूप) कहे हैं, उससे (ज्ञान का) प्रकाश होगा । असत्य रुई के समान उड़ जाएगा और सम्पूर्ण अन्धकार (अज्ञान) का नाश हो जाएगा । तेरे मुख से जो बोल (चौपाइयां) निकले हैं, तू उनके अर्थ को अच्छी तरह से समझना । यदि तुम्हारी आत्मा साक्षी दे, तो उन्हें शिरोधार्य (पालन) करना । जितनी सुहागनियां (आत्माएं) हैं, खसम उनसे भिन्न खड़ा है । तू अपने दिल से पूछकर देख (कि क्या मैं तुझसे भी दूर हूं) और मन को दृढ़ करके (जागनी) कार्य कर ।"



(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/98 (2) प्रकास हि. 37/99 (3) प्रकास हि. 37/100 (4) कलस हिन्दुस्तानी 10/15 (5) कलस हि. 9/29 (6) कलस हि. 8/8 (7) कलस हि. 5/12 (8) कलस हि. 9/8 (9) कलस हि. 8/11 (10) कलस हि. 9/3 (11) कलस हि. 9/6 (12) कलस हि. 9/7 (13) कलस हि. 9/30-44