जड़ पूजा | Jad Pooja
जड़ पूजा का अर्थ है पांच तत्वों से बने जड़ पदार्थों की पूजा करना, जैसे- मूर्ति, चित्र, भवन, नदी, पहाड़, अग्नि, पेड़-पौधे, समाधि, तखत, सिंहासन, मुकुट, कलश, खड़ाऊ, सूर्य आदि ।
वेद, शास्त्र, कुरान और बाइबल में जड़ पूजा करने से मना किया गया है, परन्तु फिर भी उसके अनुयायी अज्ञानता वश ऐसा करने से स्वयं को रोक नहीं पाते ।
हिन्दू समाज तो जड़ पूजा में बुरी तरह फंसा हुआ है । मुस्लिम स्वयं को जड़ पूजा का विरोधी कहते हैं, फिर भी दरगाहों और मजारों की पूजा छोड़ नहीं पाते । ईसाई भी चर्च में ईसा मसीह की मूर्ति लगाते हैं ।
इतिहास में जड़ पूजा
वैदिक काल में जड़ पूजा का कोई प्रामाणिक वर्णन नहीं है । उस समय मन्दिर भी नहीं होते थे । ऋषि-मुनि जो यज्ञ या हवन करते थे, उसका वैज्ञानिक कारण होता था, उसे अग्नि-पूजा नहीं समझना चाहिए । त्रेता युग में श्री राम और सीता प्रतिदिन नियमित रूप से संध्या करते थे । उस काल में कहीं भी मूर्ति पूजा का वर्णन नहीं है, सिर्फ रावण अपनी तामसिक प्रवृत्ति के कारण लिंग की पूजा करता था । द्वापर युग में श्री कृष्ण प्रतिदिन दोनों समय संध्या करते थे और रात भर परमात्मा का ध्यान भी करते थे ।
कतेब पक्ष में मूसा पैगम्बर की कहानी प्रसिद्ध है । जब वे पहाड़ पर दर्शन करने गए, तो पीछे से उनके अनुयायियों ने एक मूर्ति बनाकर उसकी पूजा प्रारम्भ कर दी । जब वे लौटे तो इस अनुचित कार्य के लिए उन्होंने अपने अनुयायियों को बहुत फटकारा । पैगम्बर मोहम्मद ने भी मक्का में मूर्तियों को अपनी चमत्कारिक लाठी से खण्डित करके जड़ पूजा को समाप्त किया ।
मूर्ति पूजा की प्रथा सम्भवतः बुद्ध के अनुयायियों ने प्रारम्भ की । बाद में हिन्दुओं ने भी उनका अनुसरण कर लिया । अपने मन को झूठी तसल्ली देने के लिए हिन्दुओं ने प्राण-प्रतिष्ठा का विधान रच लिया, परन्तु सभी जानते हैं कि कुछ भी करके जड़ मूर्ति को चेतन नहीं बनाया जा सकता । वस्तुतः जड़ को चेतन बनाने की शक्ति व अधिकार सिर्फ परमात्मा के पास है ।
जड़ पूजा से हानि
जो जड़ पदार्थों की पूजा या ध्यान करता है, उसकी बुद्धि भी जड़ हो जाती है ।1
जब मनुष्य की बुद्धि जड़ हो जाती है, तो वह अज्ञानता में डूबकर अनेक अन्धविश्वासों व झूठी मान्यताओं में फंस जाता है, और अन्ततः परमात्मा से विमुख हो जाता है । इसलिए ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि जड़ पूजा करने से विनाश ही विनाश होता है ।
जब सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया, तब भारत में मूर्ति पूजा नहीं होती थी, अपितु गुरुकुलों में वेद-शास्त्र व अन्य विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी । इसी लिए भारत सिकन्दर को पराजित करने में सफल हो सका । इसके विपरित मूर्ति पूजा के आने के बाद हिन्दुओं ने एक हजार वर्षों तक मुस्लिमों और अंग्रेजों की पराधीनता झेली । सोचने वाली बात है कि जब एक जड़ मूर्ति अपनी रक्षा नहीं कर सकती, तो हमारी रक्षा कैसे करेगी ?
जड़ पूजा नहीं तो क्या करें
जड़ पूजा की अपेक्षा स्वाध्याय और ध्यान का मार्ग पकड़ना चाहिए ।
(1) योग दर्शन
