Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

निराकार

इस स्वप्न (संसार) में दसों दिशाओं में भवसागर फैला हुआ है । उसके चारों तरफ मोह का आवरण है, जो निराकार या शून्य कहलाता है ।1

शाब्दिक अर्थ में, जिसका कोई आकार या रूप न हो, उसे निराकार कहते हैं । निराकार को मोह, मोह सागर, शून्य, नींद, अज्ञान, भ्रम, अन्धकार, आदि भी कहते हैं ।

यह तीनों लोक अन्धकार (निराकार) से बने हैं और तीनों को अन्धकार (अज्ञानता) ने ही घेर रखा है । मैंने अच्छी तरह परख लिया है कि किसी को भी इससे परे का थोड़ा भी ज्ञान नहीं है ।2

इस स्वप्नमयी संसार के सभी प्राणी नींद (निराकार) तक सीमित हैं और नींद ही उनका आधार है । यदि वे इससे आगे जाने के लिए बल लगाते हैं, तो निराकार में गल जाते हैं ।3



(1) कलस हिन्दुस्तानी 17/26 (2) कलस हि. 1/21 (3) कलस हि. 2/36