मोह
मोह का अर्थ होता है सांसारिक आकर्षण । मोह एक ऐसा तत्व है, जिसका आवरण संसार के चारों ओर है और इस जगत की प्रत्येक वस्तु उसी से बनी है ।
मोह को निराकार, माया, महा शून्य, मोह तत्व, शून्य, अज्ञान, भ्रम, छल, अन्धकार आदि भी कहते हैं । मोह को मोह सागर या भवसागर की संज्ञा भी दी जाती है ।
यह पांचों तत्व मोह से उत्पन्न हुए थे और मोह का तो कोई पार ही नहीं है ।1
मोह तत्व
तुम इस बात को स्पष्ट रूप से देखो कि (मोह से) पांचों तत्व उत्पन्न हुए हैं । इसी मोह (निराकार) के अन्दर मन (अक्षर ब्रह्म के मन अव्याकृत का स्वप्न स्वरूप आदि नारायण) खेलता है और सारा संसार उसी मन की उत्पत्ति है ।2
मोह का बन्धन
माया की इच्छाओं के बढ़ने से मोह बढ़ता है । यही मोह रूपी निद्रा ही सभी विकारों का मूल है ।3
सब इसी (ब्रह्माण्ड) में अटक कर रह गए हैं, जिसके बीच में गोल इण्ड है और चारों तरफ मोह तत्व का आवरण है । कोई आगे का सेर भर शब्द (ज्ञान) भी नहीं पाता ।4
साधु (ज्ञानी) वेद, वेदान्त और शास्त्रों का ज्ञान लेकर दौड़ते हैं, परन्तु मोह (माया) उन्हें आगे नहीं जाने देता ।5
मोह सागर या भवसागर
इस खारे (मोह) सागर की लेहेरें (जीव को) मार मारती रहती हैं, जिनसे पछाड़ खाकर वह टापुओं (विभिन्न योनियों) के बीच बेसुध पड़ा रहता है । इस खेल में ऐसे मगरमच्छ (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, मत्सर) मिलते हैं, जो उसका गला पकड़कर उछालते हैं । प्रत्येक सन्धि (माया से) बंधी है, फिर भी ऐसे अन्धों (अज्ञानी जीवों) को यही (संसार) भाता है ।6
इस (भवसागर) के घाट (ज्ञान के मार्ग) भयानक हैं, जिनके पत्थरों पर बहुत चिकनाई (संशय) है । वहां चींटी (जीव) के हाथ या पैर नहीं टिक सकते । वायु का बढ़ता प्रवाह आग (तृष्णा) को फैलाता जाता है । इस अग्नि में (आत्मा रूपी पक्षी के) पंख (इश्क और ईमान) जल जाते हैं, जिससे वह उड़ नहीं पाता ।7
इस (मोह जल) में आड़े-टेढ़े बहाव हैं । इसके अन्दर भयानक जीव (काम, क्रोध, लालच, मोह, अहंकार, ईर्ष्या) हैं । निश्चित् रूप से यह दुःख रूपी सागर है, जिसमें आसपास कोई किनारा या टापू (ज्ञान का सहारा) नहीं है ।8
यह (मोह जल) चारों तरफ ऊंचा, नीचा और गहरा है । अब इतना कठिन समय आ गया है कि हाथ, पैर या सिर भी नहीं सूझता (सत्य-असत्य का बोध नहीं होता) । इस अन्धकार (अज्ञान) से निकला नहीं जाता ।9
मोह से मुक्ति का मार्ग
जिसने यह बन्धन बांधे हैं, वही खोल सकते हैं । उन (परब्रह्म) के खोले बिना यह बन्धन छूट नहीं सकते ।10
परब्रह्म अक्षरातीत की आज्ञा से ही निज बुद्धि (धाम की बुद्धि) आती है । उसके बिना मोह नहीं छूट सकता । आत्मा तो अन्धकार (संसार) में है, तो निज बुद्धि के बिना यहां उसका बल नहीं चल सकता ।11
(1) कलस हिन्दुस्तानी 1/27 (2) कलस हि. 17/24 (3) कलस हि. 21/21 (4) कलस हि. 2/34 (5) कलस हि. 2/24 (6) कलस हि. 3/3 (7) कलस हि. 3/5 (8) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/86 (9) प्रकास हि. 37/87 (10) कलस हि. 1/35 (11) कलस हि. 1/36
