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परात्म | Paraatam

आत्मा का मूल तन जो धाम में विराजमान है, उसे परात्म कहते हैं । परात्म को परब्रह्म का ही स्वरूप मानना चाहिए ।

आत्माएं माया का खेल देखने संसार में आई हैं, इसलिए उनकी परात्म बेसुधी में है ।

(जब) प्रियतम (धाम में) हंसते हुए ताली बजाएंगे (तब खेल समाप्त होगा) और सब साथ (परात्म) हंसते व सुख लेते हुए उठेंगे ।1



(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/118