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विषय-सूची

परमात्मा

परमात्मा का अर्थ है परम आत्मा अर्थात् आत्माओं का स्वामी । एक परब्रह्म अक्षरातीत को ही परमात्मा कहते हैं ।

क्या हम परमात्मा तक पहुंच सकते हैं ?

यह खेल बेहिसाब (अनन्त) है । आप अपनी बुद्धि से देखिए, खसम (प्रियतम) ने यह स्वप्न रचा है । बाजीगर (सृष्टिकर्ता) परे रहता है । यह उसके कबूतर (स्वप्न के जीव) खेल रहे हैं । तो जो खेल के कबूतर हैं, वह बाजीगर तक कैसे पहुंच सकते हैं ?1

परमात्मा कितने हैं ?

(संसार के लोगों ने) स्वयं ही खसम के अलग-अलग अनेक नाम धर दिए हैं । अनेक रंग और ढंग से प्रियतम की भक्ति करते हैं । इस प्रकार सब अपने विवेक के अनुसार तरह-तरह से खेल रहे हैं । सब का खसम (प्रियतम) एक ही है, कोई दूसरा नहीं है । (संसार के जीव) इस बात का विचार तो तब करें, जब स्वयं सत्य हों (जब उनका मूल स्वरूप अखण्ड हो) ।2

परमात्मा साकार है या निराकार है ?

जो काल (मृत्यु) के अधीन है, उसे आकार नहीं कहा जा सकता । जो काल के अधीन है, वह निराकार है । आकार सदा अविनाशी होता है ।3

(संसार के लोग) आकार को निराकार कहते हैं (साकार परमात्मा को आकार से रहित मानते हैं) और निराकार को आकार कहते हैं (निराकार से उत्पन्न अपने स्वप्नमयी शरीर को साकार मानते हैं) । स्वयं (जन्म-मरण के चक्र में) फिरते हैं और सब लोगों को भी फिरते देखते हैं । इस प्रकार (यह संसार) निर्मूल और असत्य (नश्वर) है ।4



(1) कलस हिन्दुस्तानी 14/32,31 (2) कलस हि. 14/33,34 (3) कलस हि. 16/26 (4) कलस हि. 16/24