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श्री देवचन्द्र द्वारा घर पर बांके बिहारी के वस्त्रों की सेवा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०

हरिदास जी ने बांके बिहारी का जामा (वस्त्र) सेवा करने के लिए देवचन्द्र जी को दे दिया । श्री देवचन्द्र ने आदरपूर्वक वस्त्रों को अपने घर में एक सिंहासन पर पधराया और सच्चे हृदय से उनकी सेवा करने लगे ।

श्री देवचन्द्र जी सेवा के लिए अपने सिर पर जल भरकर लाते । यदि मार्ग में किसी की परछाईं भी पड़ जाती, तो उस जल को गिराकर पुनः शुद्ध जल लेने जाते, तब उससे सेवा करते । अपने प्रियतम को भोग लगाने के लिए वे बहुत विचार करके अलग-अलग तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाते, परन्तु अपने सेवन के लिए अलग से सादा भोजन बनाते ।

जब लोग श्री देवचन्द्र जी को इस प्रकार परिश्रम से घर के कार्य करते देखते, तो वे देवचन्द्र जी की पत्नी लीलबाई को कहने लगे- "तुम कैसी स्त्री हो कि तुम्हारे होते हुए देवचन्द्र जी को इतनी मेहनत करनी पड़ती है ? रसोई, चौका और जल भरने की सेवा तो तुमको करनी चाहिए ।"

तब लीलबाई ने देवचन्द्र जी से अर्ज करी- "सब लोग मुझे ताना मारते हैं । आप रसोई की सारी सेवा मुझे करने दीजिए ।"

श्री देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "यह तुम्हारा काम नहीं है । यदि जल भरकर लाने के परिश्रम से या अन्य कार्यों से कभी तुम्हारा मन दुःखी हो गया, तो मेरा सेवा धर्म कहां रह जाएगा ? अभी तुम्हें मेरे आराध्य की पहचान नहीं है, इसलिए तुम मेरे समान सेवा नहीं कर सकती । यदि मैं सारी सेवा स्वयं न करूं, तो उनके प्रति मेरे प्रेम में बाधा पहुंचती है ।"

इस प्रकार श्री देवचन्द्र सारी सेवा स्वयं करते रहे ।

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