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श्री देवचन्द्र को चितवन में दर्शन

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११

श्री देवचन्द्र जी सेवा के साथ-साथ अपने प्रियतम का चितवन (ध्यान) भी करते थे । एक दिन ध्यान में उन्हें अलौकिक लीला का दर्शन हुआ ।

देवचन्द्र जी को ध्यान में ऐसा प्रतीत हुआ कि वे ब्रज में नन्द जी के घर के सामने खड़े हैं । वहां पर यशोदा जी पीढ़ी पर बैठकर दूध उबाल रही थीं ।

देवचन्द्र जी को देखकर प्रसन्न भाव से यशोदा जी ने कहा- "आओ देवचन्द्र जी, भोजन कर लो ।"

देवचन्द्र जी ने पूछा- "कृष्ण जी कहां हैं ? मैं उनका दर्शन करना चाहता हूं ।"

यशोदा जी ने उत्तर दिया- "कृष्ण तो वन में खेलने गया है ।"

देवचन्द्र जी ने कहा- "मेरा मन उनके चरणों में है, मैं वहीं जाना चाहता हूं ।"

यशोदा जी ने घर से मिठाई मंगवाकर देवचन्द्र जी के हाथ में दे दी और कहा- "इसे वहीं पर दोनों साथ मिलकर खा लेना ।"

अब श्री देवचन्द्र जी वन की तरफ चले । वहां कुछ बालक खेल रहे थे, तो उनसे पूछा- "कृष्ण जी कहां हैं ?"

बालकों ने उत्तर दिया- "यहां तो हर टोले में कृष्ण नाम का बालक है । आप किस कृष्ण को पूछ रहे हैं ?"

श्री देवचन्द्र जी ने कहा- "नन्द जी के पुत्र ।"

बालकों ने उत्तर दिया- "यहां बहुत से कृष्ण हैं, जिनके पिता का नाम नन्द है । आप किसको पूछ रहे हैं ?"

श्री देवचन्द्र जी ने कहा- "यशोदा जी के पुत्र ।"

तब तक श्री कृष्ण ने उन्हें देख लिया और देवचन्द्र जी को बुलाकर अपने पास बिठा लिया । फिर वे विशेष प्रेम भाव से मीठी बातें करने लगे ।

उस समय भोजन के लिए बालकों द्वारा घूंघरी (गेहूं के दानों से बना मीठा व्यंजन) बनाई जा रही थी । श्री देवचन्द्र जी जो मिठाई यशोदा जी से लाए थे, उसे कृष्ण जी के आगे रख दिया ।

श्री कृष्ण जी ने बालकों से कहा- "सभी खाद्य पदार्थ में से दो भाग मुझे दे दो और शेष आपस में बांट लो ।"

जैसे ही श्री देवचन्द्र जी अपने सामने परोसी गई सामग्री खाने लगे, उनका हाथ जमीन से टकराया और ध्यान टूट गया ।

ध्यान टूटने के बाद श्री देवचन्द्र जी ने मन में बहुत विचार करके यह निश्चय किया कि यही मेरा प्रियतम है और उन्होंने उसी स्वरूप को अपने हृदय में बसा लिया । वे पूरी श्रद्धा के साथ उसी स्वरूप को भोग लगाने लगे ।

इस प्रकार सेवा और चितवन करते हुए देवचन्द्र जी को भोजनगर में कई वर्ष बीत गए ।

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