दिल्ली से मोमिन वापस लौटे
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०२
जिन बारह सुन्दरसाथ ने सुल्तान औरंगज़ेब से धर्म युद्ध लड़ा, उन्हें दिल्ली में रहते हुए चार मास व्यतीत हो गए थे ।
उन्होंने पाती लिखकर श्री जी से अर्ज की- "हम शरीयत से लड़े और अपनी आंखों से देख लिया कि जब तक इन पर सोटे (दण्ड) नहीं पड़ते, तब तक ये ईमान नहीं ला सकते । इन्हें अल्लाह (परब्रह्म) पर जरा भी ईमान नहीं है, इसीलिए इन्होंने उनके पैगाम को ठुकरा दिया और उनके हुक्म को सुना तक नहीं । अब हम आपके हुक्म की राह देख रहे हैं । आप जैसा लिखकर भेजेंगे, हम वैसा ही करेंगे ।"
तब श्री जी ने उत्तर में पाती लिखकर भेजी- "आप वहां से उठकर आ जाइए । धाम धनी के हुक्म से इन पर सोटा होएगा, अर्थात् इन्हें दण्ड मिलेगा ।"
जब यह पाती लेकर शेख बदल दिल्ली पहुंचे, तो इसे पढ़कर मोमिनों को बहुत प्रसन्नता हुई । मोमिनों ने तुरन्त काज़ी शेख इस्लाम से मिलकर आग्रह किया कि वे अब अपने स्थान पर जाने के लिए अनुमति चाहते हैं । काज़ी ने उत्तर दिया कि वे सुल्तान औरंगज़ेब से अनुमति लेकर परसों तक बताएंगे ।
दो दिन बाद जब मोमिन काज़ी के पास गए, तो उसने उन्हें सुल्तान के समक्ष खड़ा कर दिया और सुल्तान को स्मरण दिलाते हुए कहा- "ये वही मोमिन हैं, जिनसे उस दिन आपकी बात हुई थी । ये लोग इस्लाम पर ईमान लाए हैं । अब ये विदा होकर अपने स्थान जा रहे हैं ।"
सुल्तान औरंगज़ेब ने तीन बार उनकी तरफ दृष्टि घुमाकर देखा । फिर सिर झुकाकर बोला- "खुदा इनको खैर दे (कृपा करे) ।" मोमिनों को खर्च के लिए सुल्तान ने सौ रुपये देने का हुक्म दिया ।
सुल्तान औरंगज़ेब से विदा लेकर सुन्दरसाथ उदयपुर पहुंचे और श्री जी से भेंट की । दिल्ली से आने वाले सुन्दरसाथ में शेख बदल, लक्ष्मण भाई (लालदास), भीम भाई, श्याम दास, खिमाई भाई, श्यामल दास, गरीब दास, लाल बाई, श्याम बाई, और राम राय शामिल थे । श्री जी के चरणों में पहुंचते ही इन्हें सुख का अनुभव हुआ और इन्होंने अपनी आत्मा श्री जी के चरणों में समर्पित कर दी ।
उदयपुर में कुछ साथ दिल्ली से लौटे सुन्दरसाथ की निंदा करने लगे, क्योंकि उन्होंने औरंगज़ेब को सन्देश देने के लिए मुस्लिम भेष धारण किया था । जब श्री जी को इस बात का पता चला, तो उन्होंने सब सुन्दरसाथ की जोरदार खण्डनी की ।
श्री जी ने सुन्दरसाथ का भेष बदलवाकर सबको एक जैसा फकीरी (वैरागी) भेष धारण करवा दिया और कानों में श्रवणी पहनाई । कुछ साथ रो-धोकर इसके लिए राजी हुई, तो कुछ ने प्रसन्नता से नया वेश स्वीकार किया । इस प्रकार सुन्दरसाथ के अवगुण दूर हो गए और वे रहनी के मार्ग पर अग्रसर हुए ।
इस समय दिल्ली से दयाराम, चंचल, गंगाराम और बनारसी, तथा सूरत से मोहन और चतुर्भुज ने आकर श्री जी के चरणों में प्रणाम किया । और भी कितने साथी आए जिन्होंने अपनी आत्मा को श्री जी के चरणों में समर्पित कर दिया ।
अगला प्रसंग- राणा को पहचान न हो सकी
