राणा को पहचान न हो सकी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०३
उदयपुर के राणा राज सिंह ने अपनी सभा में श्री जी और सुन्दरसाथ के विषय में सुना । नित्य ही लोग आकर सुन्दरसाथ के विषय में स्तुति या निंदा के वचन कहते ।
कोई कहता कि वे बड़े साधू हैं और उनके अनन्त लोचन हैं । कोई कहता कि वे ठग हैं और उन्होंने साधू का भेष धारण कर रखा है । कोई कहता कि वे तो मुसलमान हैं और उन्हें सुल्तान ने आपको मुसलमान बनाने के लिए भेजा है । कोई कहता कि वे तो कुरान पढ़ते हैं, कोई कहता कि वे वेद और कतेब दोनों का अध्ययन करते हैं । इस प्रकार, श्री जी साहिब जी के स्वरूप की पहचान किए बिना, वहां के लोग राणा के सामने तरह-तरह की बातें करके उनके अवगुण बताने लगे ।
राणा ने वास्तविकता का पता लगाने के लिए अपनी सभा के पण्डितों को श्री जी के पास भेजा । उसने उन्हें निर्देश दिया- "आप जाकर देखिए कि वहां कैसी चर्चा होती है और उसे विस्तार से मुझे बताइए ।"
वे सब पण्डित तो पेटारथू (धन कमाने के लिए कर्मकाण्ड करवाने वाले) थे । उन्हें आत्म-कल्याण से कुछ काम नहीं था । जब उन्होंने श्री जी को ब्रह्मज्ञान की चर्चा करते देखा, तो वे चिन्ता में पड़ गए कि श्री जी के प्रश्नों का उत्तर कैसे देंगे ?
चर्चा के पश्चात् श्री जी ने पण्डितों से भागवत के चालीस और वेदान्त के पन्द्रह प्रश्न पूछे ।
जब उन्हें उत्तर नहीं सूझा, तो वे सब मिलकर विचार करने लगे- "ये वैरागी तो बहुत बुरे हैं । ये अवश्य हमारा रोजगार (आय) छीन लेंगे । अब एक ही उपाय है कि हम सब मिलकर इनकी निंदा करें ।"
ब्राह्मणों के पूज्य ब्रह्मा जी ने भी यही भूल की थी । जब श्री कृष्ण गर्भ में थे, तब ब्रह्मा जी ने उन्हें पहचानकर उनकी स्तुति की । जन्म के बाद, वही ब्रह्मा जी सब कुछ भूलकर उनकी परीक्षा लेने आए ।
दूसरा प्रसंग ब्रज का है । कुछ ऋषि यज्ञ कर रहे थे, तो श्री कृष्ण ने ग्वाल-सखाओं को भेजकर उनसे अन्न मंगवाया, परन्तु वे यज्ञ में मग्न रहे । तब उनकी पत्नियों ने श्री कृष्ण के स्वरूप को पहचाना और ग्वालों को श्रद्धा भाव से भोजन दिया । इसलिए उन स्त्रियों को शोभा मिली और आज तक उनकी चर्चा होती है ।
ब्राह्मणों के पूज्य भृगु ने भगवान विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनकी छाती पर लात मारी थी । आज के पण्डित उन्हीं के वंशज हैं । अपने पूर्वजों की भांति, ये भी श्री जी के वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए अयोग्य थे ।
ये पण्डित राणा के सामने निंदा करने लगे- "ये वैरागी किसी काम के नहीं हैं । इन्हें आंखों से देखना भी नहीं चाहिए ।"
राणा इन पण्डितों की बात से भ्रमित हो गया । दूसरी बात यह है कि अंकुर के अनुसार ही बुद्धि की गति होती है । इसलिए राणा को श्री जी के स्वरूप की कुछ भी पहचान न हो सकी ।
एक दिन राणा उदयपुर के ताल पर गया । उसी समय श्री जी साहिब जी, श्री बाई जी और कुछ सुन्दरसाथ भी ताल पर गए हुए थे । वहां एक हवेली लेकर श्री जी सहित सुन्दरसाथ ने डेरा जमा रखा था । जब वहां श्री जी ने चर्चा प्रारम्भ की, तो लोग आने लगे और सबको बहुत आनन्द का अनुभव हुआ ।
एक दिन जब रास का किरन्तन गाया जा रहा था, तब राणा चुपके से मुंह छिपाकर श्री जी का दर्शन करने आया । वह दूर खड़ा होकर रास लीला का विहार देखता रहा । उसका जितना अंकुर था, उतना ही उसने फल लिया । जितनी धाम धनी की आज्ञा थी, उतनी देर तक वह वहां रहा और उतना ही आनन्द ले सका ।
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