Kuljam.org

विषय-सूची

श्री जी साहिब का वैरागी भेष

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०५

उदयपुर से चलते समय श्री जी ने ऐसा अनुपम वैरागी (फकीरी) भेष धारण कर रखा था कि उनके स्वरूप की शोभा पर करोड़ों सुन्दर रूप अर्पित हो जाएं ।

उनके सिर पर गोटा (कपड़ा) बंधा है, जिस पर कनढप्पी (कान को ढकने वाली टोपी) पहनते हैं । माथे पर सफेद चन्दन का अति सुन्दर तिलक बना है, जिसमें दो पतली रेखाओं के बीच में बिन्द है । श्री जी का मुख चन्द्रमा के समान सुशोभित है । उनके कानों में श्रवणी तथा दो कंचन के बाले शोभायमान हैं । उनकी प्रेम भरी छवि सबको लुभाने वाली है तथा उन्हें अपना यह वैरागी भेष बहुत प्रिय है ।

श्री जी अपने गले में तुलसी की कण्ठी और चार बड़ी माला पहनते हैं । लोइ के धागों से बनी मेखली (लम्बा कुर्ता) उनके ऊपर बहुत शोभायमान होती है । श्री जी ने अपने हाथों से बनी गोदड़ी (चादर) ओढ़ रखी है । वे गले में सेली पहनते हैं । एक हाथ में सुमरणी (जप करने वाली माला) और दूसरे हाथ में छड़ी उनकी शोभा को बढ़ा रहे हैं । वे आधी धोती नीचे पहनते हैं और शेष को ऊपर ओढ़ लेते हैं । कमर पर अंगोछा बांधते हैं । श्री जी की यह सुन्दर छवि ब्रह्माण्ड में सर्वश्रेष्ठ है ।

श्री जी का एक तूंबा (कद्दू से बना पात्र) हाथ में और दूसरा कमर में बंधा है । उनके कंधे पर एक झोली टंगी है, जिसमें आवश्यकता का सारा सामान रखते हैं । उन्होंने पैरों में पनहीं (खड़ाऊ) पहन रखी हैं और वे चटकनी (जोरदार) चाल से चलते हैं । उनके साथ कई मोमिन हैं, जो बहुत खुशी से साथ चलते हैं ।

श्री बाई जी ने भी निर्गुण भेष धारण कर रखा है । सभी सुन्दरसाथ ने अपने साहिब जैसा भेष पहन रखा है । खेल देखने की चाह लेकर सुन्दरसाथ इस संसार में आए थे, सो ऐसी लीला देखकर सब बहुत प्रसन्नता का अनुभव करते हैं । वैरागी भेष धारण करके मोमिन दज्जाल (सांसारिक इच्छाओं) से युद्ध करते हैं ।

श्री जी की इस शोभा पर एक किरंतन भी प्रकट हुआ- "कारी कामरी रे मोको प्यारी लागी तूं ।"

अगला प्रसंग- दुधलाई ग्राम का प्रसंग