दुधलाई ग्राम का प्रसंग
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०६
उदयपुर से चलकर रामपुरा के मार्ग में दुधलाई ग्राम है, जहां पूरनमल चारन रहते थे । वहां पहुंचकर सुन्दरसाथ ने रहने के लिए पहले ईंटें बनायीं, फिर उससे हवेली बनाकर खड़ी कर दी । उस हवेली में श्री जी साहिब जी और श्री बाई जी को पधराया ।
सुन्दरसाथ के अतिरिक्त पूरनमल चारन की माता भी उनकी सेवा में तत्पर रहती थीं । उन्हें श्री जी के स्वरूप की सिर्फ ऊपरी पहचान थी ।
राजा के भाई बेरीसाल के मन में दज्जाल (माया) ने जोर किया और उसने सुन्दरसाथ पर बुरी नजर करी कि उन्हें लूट लिया जाए । तब सुन्दरसाथ ने पूरनमल चारन के घर जाकर उनसे अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना की । यह सुनकर चारन की माता कमर बांधकर लड़ने के लिए तैयार हो गई ।
उसने बेरीसाल से कहा- "मेरे घर में साधुजन आए हैं । जो भी इन वैरागियों पर बुरी नजर डालेगा, या तो मैं उसे मार डालूंगी, या मैं स्वयं मरकर हत्या का दोष उसके सिर दे जाऊंगी ।"
तब बेरीसाल अपमानित होकर वापस लौट गया । उसका कुछ भी जोर नहीं चला और बुरा हाल हुआ ।
श्री जी ने मुकुन्द दास, केशव दास, खिमाई भाई और वल्लभ को औरंगाबाद जाने का निर्देश देते हुए कहा- "आप लोग राजा भाव सिंह को परखिए कि उसके जाग्रत होने की कुछ आशा है या नहीं ? यदि वह तारतम ज्ञान से प्रभावित होकर मुझे वहां बुलाता है, तो मैं वहां आ जाऊंगा । जैसी स्थिति देखना, वैसा वहां जाकर लिखना ।"
इसके बाद श्री जी और सब सुन्दरसाथ भी उस हवेली को छोड़कर मन्दसौर के लिए निकल पड़े ।
अगला प्रसंग- मन्दसौर आगमन
