नवतनपुरी में भागवत कथा श्रवण
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२
श्री देवचन्द्र जी अपने परिवार के साथ भोजनगर से चलकर नवतनपुरी (जामनगर) आ गए ।
नवतनपुरी में वल्लभाचार्य मत का बहुत जोर था । वहीं श्याम मन्दिर में कान्हजी भट्ट भागवत कथा सुनाते थे । देवचन्द्र जी नियमित रूप से कथा सुनने के लिए जाने लगे, किन्तु अन्य वल्लभियों से श्री देवचन्द्र जी की अनबन होने लगी ।
देवचन्द्र जी पहले कथा सुनकर अपनी आत्मा को आहार देते, तद्पश्चात् भोजन ग्रहण करके अपने शरीर को आहार देते । यदि कथा में देर से पहुंचने के कारण एक-दो श्लोक छूट जाते, तो वे कान्हजी भट्ट के घर जाकर दोबारा पुस्तक पधरवाकर उन श्लोकों की व्याख्या सुनते, तब अपने घर लौटते । देवचन्द्र जी की ऐसी निष्ठा के कारण, कान्हजी भट्ट तब तक भागवत कथा प्रारम्भ नहीं करते थे, जब तक देवचन्द्र जी आ नहीं जाते ।
श्री देवचन्द्र के अतिरिक्त कथा सुनने वाले अन्य श्रोता शहर के चौधरी व साहूकार थे, जो वल्लभी मार्ग से जुड़े हुए थे । देवचन्द्र जी की महत्ता देखकर उन्हें ईर्ष्या होती थी, इसलिए वे देवचन्द्र जी से वाद-विवाद करते रहते ।
एक दिन उन लोगों ने मिलकर भट्ट जी से पूछा- "क्या आपको देवचन्द्र जी से कुछ आमदनी होती है ? फिर क्या कारण है कि जब तक वे नहीं आते, तब तक आप कथा प्रारम्भ नहीं करते ?"
तब कान्हजी भट्ट ने उत्तर दिया- "मुझे किसी से कुछ आशा नहीं है । मैं तो श्याम जी के सम्मुख उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भागवत बांचता हूं, परन्तु श्री देवचन्द्र जी उस कथा को बहुत ध्यान से सुनते हैं । मुझे तो आप जैसे सेठों से ही धन प्राप्त होता है, भला वे गरीब मुझे क्या दे सकते हैं ? परन्तु यदि मैं कोई श्लोक आगे-पीछे बोल जाऊं, तो क्या आप लोगों में से कोई पूछता है ? यदि कोई श्लोक छूट जाए, तो देवचन्द्र जी मेरे घर आकर पुनः भागवत पधरवाकर उस श्लोक को सुनते हैं ।"
भट्ट जी का उत्तर सुनकर सभी श्रोता मौन होकर अपने-अपने घर लौट गए, परन्तु उनके मन का रोष नहीं गया । बाहरी दृष्टि और अहंकार से परिपूर्ण वे लोग हमेशा देवचन्द्र जी की कमी ढूंढने में लगे रहते और विवाद करने के लिए हमेशा तैयार रहते ।
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