पौराणिक परम्पराओं की निरर्थकता
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३
पौराणिक परम्परा के अनुसार एकादशी के दिन अधिक समय तक भागवत कथा होती थी तथा सभी लोग उपवास भी रखते थे, जबकि द्वादश को कथा के स्थान पर भण्डारा होता था । श्री देवचन्द्र जी इस परम्परा के विपरीत कार्य करते थे । वे एकादशी को कथा के बाद भरपेट खाते थे तथा द्वादश को उपवास करते थे ।
जब यह बात उन लोगों को पता चली, तो वे देवचन्द्र जी की निंदा करने लगे । फिर उन्होंने इस बात की शिकायत कान्हजी भट्ट से की । जब देवचन्द्र जी आए, तो भट्ट जी ने भरी सभा में उनसे पूछा कि क्या ये बात सत्य है ? देवचन्द्र जी ने इस सत्य को स्वीकार कर लिया ।
अब सभी श्रोताओं ने देवचन्द्र जी से इसका स्पष्टीकरण मांगते हुए व्यंग्यपूर्ण शैली में कहा- "तुम ऐसा क्यों करते हो यह तो हमें नहीं पता, परन्तु हमें इतना पता है कि यदि भागवत एक वृक्ष है तो उसकी डाली तक कोई विरला ही पहुंच पाता है, परन्तु तुम तो इस वृक्ष के एक-एक पत्ते की एक-एक रग में हो । आपके जैसे विचार किसी अन्य में कैसे हो सकते हैं ?"
श्री देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "मैंने ऐसा प्रण किया है कि जब तक भागवत कथा रूपी आहार आत्मा को न मिल जाए, तब तक मैं भोजन ग्रहण नहीं करता । द्वादशी को कथा नहीं होती, इसलिए मैं शरीर को भी भोजन नहीं देता । एकादशी को कथा होती है, इसलिए मैं उस दिन भोजन करता हूं । करोड़ों एकादशी का उपवास करने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति मानी जाती है, जबकि यह उपलब्धि तो परब्रह्म के प्रसाद के एक कण के बराबर भी नहीं है । श्रीमद्भागवत् ग्रन्थ से हमें परब्रह्म की लीला का रस मिलता है, फिर उसे छोड़कर आप लोग एकादशी उपवास जैसे साधनों के पीछे क्यों भागते हैं ?"
तब कान्हजी भट्ट ने सबसे कहा- "अब इस बात का उत्तर दीजिए ।"
किसी के पास भी उत्तर नहीं था । अब वे सब श्री देवचन्द्र जी को धन्य-धन्य कहने लगे ।
श्री देवचन्द्र ऐसे ही चर्चा के रस में डूबे रहते हैं । चर्चा के मीठे वचन सुनकर उनके नयनों से अश्रु झरते हैं । इस प्रकार चौदह वर्ष तक निष्ठाबद्ध होकर वे भागवत के ज्ञान को ग्रहण करते हैं ।
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