महामारी का प्रकोप
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२२
इस समय दज्जाल (माया) जोर करने लगा और महामारी फैल गई, जिससे सुन्दरसाथ की मृत्यु होने लगी । रामनगर में जिन सुन्दरसाथ का शरीर छूटा, उनके नाम हैं-
ईश्वरदास और उनका परिवार (उदयपुर), गोवर्धन की पत्नी रुक्मा (जामनगर), कानजी, रामजी और उनका बेटा छबीला (सूरत), श्यामलदास जो पहले कबीरपंथी आचार्य चिन्तामणि के नाम से प्रसिद्ध थे (ठट्ठानगर), निर्मल दास (सूरत), दामोदर (पाटन), फकीर मासूम, मलूक चन्द राजपूत, गुलजी की पत्नी हमो, मथुरी (बुढ़ानपुर), फकीर गरीब का पुत्र (बुढ़ानपुर), बनारसी की पत्नी लाड कुंवर (दिल्ली), नन्दराम की माता मानबाई, खेमदास की पत्नी गोमा, सदानन्द और त्रिलोकदास (उदयपुर) । लालदास की पुत्री श्याम बाई ने भी गढ़ा में अपना शरीर छोड़ दिया ।
जब तक एक को श्मशान पहुंचाते, तब तक दूसरे का शरीर छूट जाता । उस भयानक दृश्य को देखकर सुन्दरसाथ डर गए और विचार करने लगे । कुछ दिन तक ऐसे ही चलता रहा, फिर अक्षरातीत श्री राज के हुक्म से यह रोग थम गया ।
यह सभी सुन्दरसाथ श्री जी के चरणों में समर्पित थे और अपने-अपने अंकुर के अनुसार सुख लेकर चले गए । इस प्रकार दज्जाल ने बहुत से साथी छीन लिए ।
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