रामनगर में सेवा के साथी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १२३
रामनगर की हवेली में श्री जी की सेवा करने वाले सुन्दरसाथ के नाम इस प्रकार हैं ।
अन्न भण्डार को सम्भालने की सेवा पतिराम करते हैं । केशवदास और जयन्ती भाई उनकी सहायता करते हैं । इसके अतिरिक्त जयन्ती भाई सब सुन्दरसाथ को पानी पिलाने की सेवा भी करते हैं ।
गोकुलदास हाट से सामान खरीदकर लाते हैं । भोजन बनवाने से लेकर परोसने तक की सारी व्यवस्था विशेष रूप से गरीबदास के निर्देशन में होती है ।
भोजन बनाने की सेवा खेमदास, गंगाराम, सन्तदास और गोवर्धन करते हैं । बाद में सूरजमल भी इस सेवा में शामिल हो गए । इन सब पर निरीक्षक के रूप में वृन्दावन रहते हैं । जंगल से लकड़ी लाने की सेवा बराड़ी के सुन्दरसाथ करते हैं ।
वाणी गाने की सेवा में निर्मल दास और मुकुन्द दास रहते हैं । श्री बाई जी और गोदावरी भी गाने की सेवा में रहती हैं । बुआ बाई और हमो सनंध का गायन करती हैं । गाने वालों की दो मण्डलियां हैं, जो अपने-अपने समय पर गाते हैं । निर्मल दास नित्य वाणी गाकर श्री जी को सबसे अधिक रिझाते हैं ।
प्रतिदिन संध्या समय श्री जी साहिब जी की आरती उतारी जाती है । सुन्दरसाथ संशय रहित और मग्न होकर श्री जी की आरती करते हैं । इस सेवा में लालदास और मुकुन्द दास रहते हैं । उत्तम दास पखावज (ढोलक) बजाते हैं ।
आरती में निर्मल दास सबसे आगे रहते हैं । बनमाली दास हमेशा उपस्थित रहते हैं और नए-नए भावों से सेवा करते हैं । खिमाई दास ताली बजाते हैं और कन्नड़ भाई गाते हैं । कल्याण भाई संगीत की कला जमाकर आरती में सेवा करते हैं । छबील दास शंख बजाते हैं और सब सुन्दरसाथ आरती में खड़े रहते हैं ।
रामनगर में कौशल्या ने ग्यारह बार श्री जी को अपने घर पधराकर रसोई उत्सव किया । उन्होंने सुन्दरसाथ की भली-भांति से सेवा करी और धाम धनी ने उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण किया ।
उदय तिवारी ने दो बार श्री जी को अपने घर पधराकर उत्सव किया । उनके भतीजे घासी ने श्री जी को वैरागी मानकर अपना गुरु बनाया ।
रामजनी, भगवती और उनकी माता ने श्री जी से अपना आत्मिक सम्बन्ध जानकर उन्हें अपने घर पधराया और रसोई उत्सव किया ।
मकरन्द ने भी उत्सव किया और अपना तन-मन-धन श्री जी के चरणों में समर्पित कर दिया । वह श्री जी के चरणों में प्रणाम करके सदैव सेवा में खड़े रहते थे । उन्होंने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया, कुछ भी शेष नहीं रखा ।
अमरा, दत्ता और दगड़ा बराड़ी से आए थे । उन्होंने बहुत उमंग से सुन्दरसाथ में उत्सव किया और सेवा में अग्रसर हुए ।
देवी भाई और जयन्ती काका ने भी उत्सव किया । इन्होंने अपने-अपने घरों पर श्री जी को पधराया और उनके संग रहकर सेवा की ।
हीरामन बड़ई ने अपने घर पर रसोई का उत्सव किया । श्री जी और सब सुन्दरसाथ को बुलाकर इन्होंने भली प्रकार से सबकी सेवा की ।
अगला प्रसंग- औरंगज़ेब ने श्री प्राणनाथ के पीछे सेना भेजी
