श्री देवचन्द्र की अन्तिम परीक्षा
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १४
जब श्री देवचन्द्र जी को निष्ठाबद्ध होकर भागवत कथा सुनते हुए चौदह वर्ष बीत गए, तब श्री राज जी ने आवेश लीला करके उन पर कृपा करी ।
पहले तो उन्हें कुछ शारीरिक कष्ट मिले । माया उनके मार्ग में बाधा खड़ी करने लगी, परन्तु उन्होंने प्रियतम के प्रति अपनी निष्ठा को टूटने नहीं दिया ।
श्री देवचन्द्र जी को अचानक बुखार हो गया, जिसके कारण उनका भोजन छूट गया । इतना होने पर भी उन्होंने भागवत कथा में जाना बन्द नहीं किया और वे कानों पर कपड़ा लपेटकर जाने लगे ।
इस प्रकार ज्वर को दस-बारह दिन बीत गए । इतने दिन तक भोजन न करने के कारण देवचन्द्र जी के शरीर में अत्यधिक कमजोरी आ गई । फिर भी उन्होंने कथा में जाना नहीं छोड़ा ।
उनके पिता मत्तू मेहता ने वैद्य को बुलाकर उनकी नाड़ी दिखवायी । वैद्य ने औषधि तो दे दी, परन्तु साथ ही सख्त निर्देश दिया कि इन्हें किसी भी तरह से हवा नहीं लगनी चाहिए ।
तब देवचन्द्र जी की माता कुंवर बाई ने कहा- "ये तो अभी भागवत कथा सुनने जायेंगे ।"
यह सुनकर वैद्य ने औषधि वापस ले ली और कहा- "अगर ये बाहर गए, तो हवा लगने से इन्हें सन्निपात ज्वर हो जाएगा । अब मैं दोबारा यहां नहीं आऊंगा ।"
पिता मत्तू मेहता ने वैद्य से कहा- "आप बिलकुल चिन्ता न करें । हम इन्हें कहीं नहीं जाने देंगे । जब शरीर रहेगा, तभी तो धर्म के कार्य हो सकेंगे ।"
तब श्री देवचन्द्र जी ने कहा- "मैं किसी भी कारण से रूकूंगा नहीं । धर्म है, तो देह है ।"
वैद्य तो श्री देवचन्द्र जी को काढ़ा पिलाकर चला गया । जब कथा का समय हुआ, तो देवचन्द्र जी दोनों कानों को ढककर लाठी लेकर चल पड़े । उनके माता-पिता ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया, परन्तु वे कैसे मान जाते जब यह उनकी आत्मा का साधन था ।
तब श्री देवचन्द्र के पिता ने द्वार बन्द कर दिया और स्वयं उसके आगे खड़े हो गए ताकि वे बाहर न जा सकें । देवचन्द्र जी यह देखकर बहुत दुःखी हुए और पुकारने लगे- "रे मूर्खों ! मैं मरने वाला नहीं हूं । यदि आप लोग मुझे बलपूर्वक रोकने का प्रयास करेंगे, तो मेरा शरीर यहीं रह जाएगा और मेरी आत्मा वहां चली जाएगी ।"
यह सुनकर भी जब उनके पिता द्वार से नहीं हटे, तो देवचन्द्र जी मूर्छित होकर गिर पड़े । यह देखकर उनकी माता जोर से चिल्लायीं और अपने पति पर दबाव डालकर उन्होंने किसी तरह द्वार खुलवाया । श्री देवचन्द्र के पिता उनके कान में उनका नाम लेकर पुकारने लगे, परन्तु देवचन्द्र जी को न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न ही वे किसी को पहचान पा रहे थे ।
तब पिता मत्तू मेहता ने देवचन्द्र जी से कहा- "भट्ट जी का बुलावा आया है । तुम भागवत कथा सुनने जाओ । अब तुम्हें कोई नहीं रोकेगा । चलो, हम ले चलते हैं ।"
लगभग पन्द्रह मिनट बाद श्री देवचन्द्र जी को कुछ सुध आई । तब वे उठकर बैठ गये । उनका मुख सफेद हो गया था । अब मत्तू मेहता ने फिर वही बात दोहरायी । श्री देवचन्द्र जी चुपचाप श्याम मन्दिर की ओर चल पड़े और सभा में बैठकर कथा श्रवण करने लगे । भागवत कथा सुनने के बाद ही उनके मन को शान्ति मिली और जब वे घर लौटे तब तक उनका ज्वर भी समाप्त हो चुका था ।
यह उनकी अन्तिम परीक्षा थी । इसके बाद दिन-प्रतिदिन उनका स्वास्थ्य सुधरता गया । इस घटना के दस-पन्द्रह दिन के पश्चात् उन्हें श्री राज जी का साक्षात्कार हुआ । उस समय उनकी आयु ४० वर्ष थी ।
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