तेजबाई और उनकी सखियों की निष्ठा
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४८
अब्बास बन्दर में श्री प्राणनाथ जी की चर्चा सुनने बहुत लोग आने लगे । एक दिन तेजबाई नामक वृद्ध महिला पूरे परिवार के साथ श्री जी का दर्शन करने आई । वह किरंतन सुनकर मग्न हो गई और उसके मन में श्री जी के प्रति जरा भी शक नहीं रहा ।
तेजबाई के साथ जो महिलाएं आई थीं, वे सब किरंतन सुनकर गलतान हो गयीं । उन्हें किरंतन बहुत मीठे लगे । उन्होंने श्री राज के चरणों को अपने दिल में बसा लिया ।
तेजबाई और उनकी सखियां प्रतिदिन चर्चा सुनने आने लगीं । वे दिन भर चर्चा में बैठी रहतीं । अपने घर में उनका जरा भी मन नहीं लगता था ।
जब भैरों सेठ सुन्दरसाथ में शामिल हुए, तो पूरे शहर में यह बात फैल गई । तब दज्जाल (माया) ने श्री जी के विरुद्ध शोर करना प्रारम्भ कर दिया ।
सखी बाई और गोवर्धन भाई भी सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । तब भणसारी जाति के लोग निंदा करने लगे कि ये सुन्दरसाथ कहां से आ गए हैं ?
उन लोगों ने मिलकर भैरों ठक्कर से शिकायत करी- "कथा में जाने से मना करने पर भी हमारे घर की महिलाएं रुकती नहीं हैं । यदि यही स्थिति बनी रही, तो हमारी आपसे लड़ाई हो जाएगी ।"
भैरों ठक्कर ने उत्तर दिया- "हम किसी को बुलाने तो जाते नहीं हैं । आप अपनी पत्नियों को स्वयं मना करो और अपने घर में रखो । हमें यहां उनकी क्या आवश्यकता है ? यहां तो परमात्मा की चर्चा होती है । यह तो आत्मा का कार्य है । चर्चा से परमात्मा की पहचान होती है । तुम लोग न तो स्वयं सुनते हो, न अपनी महिलाओं को सुनने देते हो । हर व्यक्ति अपनी आत्मा का कल्याण चाहता है, परन्तु तुम लोगों के मन में तो कलियुग (माया) का वास है इसलिए तुम विरोध करते हो ।"
भैरों ठक्कर की बात सुनकर वे सब शरमिंदा हुए और खिसियाकर अपने-अपने घर लौट गए ।
इसके बाद उन लोगों ने अपनी-अपनी पत्नियों से लड़ना प्रारम्भ कर दिया- "तुम वहां क्यों जाती हो ? रात के समय घर से बाहर जाना तुम्हे शोभा नहीं देता ।"
तब उनकी पत्नियों ने उत्तर दिया- "हमने कोई बुरा काम नहीं किया है । हम तो वहां परमात्मा की चर्चा सुनने जाती हैं । एक तो इस देश में कभी कोई चर्चा करने वाला आता नहीं, और हमारे सौभाग्य से कोई आया है तो तुम हमारे शत्रु बनकर बाधा डालते हो । परमधाम के अंकुर से हमें श्री जी के चरण प्राप्त हुए हैं । हमने परब्रह्म के चरणों में अपनी आत्मा को सौंप दिया है । तुम्हारा अधिकार हमारी देह पर है, सो हम उसे छोड़ देते हैं । हमारे मृत शरीर तुम्हारे किस काम आएंगे ? हमें मना करोगे, तो हम जीवित नहीं रहेंगे ।"
तब वे सब लोग मिलकर उन महिलाओं की सिरदार तेजबाई के घर गए और उससे झगड़ा करने लगे- "हम चाहते हैं कि तुम उस साधू के यहां जाना बन्द कर दो ।"
तेजबाई ने कहा- "तुम मुझे वहां जाने से क्यों मना करते हो ? क्या तुम्हें मेरी वृद्धावस्था नहीं दिखाई देती ? वहां जाकर मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है ।"
उन लोगों ने पुनः कहा- "हम तुम्हें मना नहीं करते हैं, परन्तु तुम्हारी देखा-देखी हमारी पत्नियां भी चर्चा में जाती हैं । इसलिए हमारे लिए आप चर्चा सुनने न जाया करें ।"
तेजबाई ने उत्तर दिया- "तुम अपने घर जाकर अपनी पत्नियों को मना करो । मैं तो वहां जरूर जाऊंगी । तुम्हें जो करना है, कर लो ।"
तेजबाई और उसकी सखियों की निष्ठा के आगे वे लोग हार गए और उन्हें रोक नहीं सके ।
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