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अब्बास बंदर से भावपूर्ण विदाई

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४९

श्री प्राणनाथ जी की चर्चा सुनकर सुन्दरसाथ को बहुत आनन्द की अनुभूति होती थी और उनके अंग में उमंग नहीं समाती थी । चर्चा, चितवन, उत्सव का जोर होने लगा और श्री जी का सुन्दरसाथ के प्रति प्रेम बढ़ता गया ।

जब कोई नया सुन्दरसाथ आता, तो श्री जी को अपार प्रसन्नता होती । जब चर्चा में ब्रज और रास की लीलाओं का वर्णन होता, तो सुन्दरसाथ उसे भली-भांति ग्रहण करते ।

अब्बास बंदर में बहुत लोग तारतम लेकर सुन्दरसाथ में शामिल हुए- भैरों ठक्कर, देवचन्द्र भाई, अमरिया भाई, अमोलक भाई, मेर बाई, इन्द्रावती बाई, राधा बाई, सुताई, फूलबाई, रतन बाई, लच्छो बाई, तेजबाई, किसनी बाई, और यशोदा बाई । इनके अतिरिक्त और भी बहुत सुन्दरसाथ हैं, जिनके नाम कहां तक लिखें ।

भैरों ठक्कर ने सुन्दरसाथ का बहुत सेवा-सत्कार किया और श्री जी से उसका दिल बंध गया था । श्री राज ने उसका हाथ पकड़ रखा था ।

जब अब्बास बन्दर में श्री जी को दो-तीन मास बीत गए, तो उन्होंने विदा लेना चाहा । उनकी बात सुनकर भैरों ठक्कर रोते हुए बोले- "हे धाम धनी ! परमधाम की पहचान कराकर आप हमें यहां क्यों छोड़ देना चाहते हैं ? हमारी सुरता तो सिर्फ एक आपसे बंध गई है । आपके अतिरिक्त हमें और कोई काम नहीं है ।"

भैरों ठक्कर की भावपूर्ण बातें सुनकर श्री जी मन में विचार करने लगे- "यदि मैं एक वर्ष तक यहां रह जाऊं, तो सुन्दरसाथ में स्नेह बढ़ेगा और उनकी संख्या भी बढ़ेगी, परन्तु मुझे बड़ा कार्य करना है । सकुण्डल और सकुमार को जगाना है, जिससे ब्रह्माण्ड में जागनी का विस्तार होगा । हे राज ! मैं तो एक ही स्थान पर अटक गया हूं । यहां के सुन्दरसाथ मुझे छोड़ते नहीं हैं । मुझे अनेक स्थानों पर आत्माओं को जाग्रत करना है ।"

श्री राज के हुक्म से विचित्र घटना घटी । कुछ दिन पश्चात् उस नगर के अधिकारी का स्थानांतरण हो गया । उसके स्थान पर जो नया अधिकारी आने वाला था, वह बहुत क्रूर था और गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार करता था । उसके आने की सूचना मिलने पर लोग रात में ही शहर छोड़कर भागने लगे ।

श्री जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भैरों ठक्कर पर थी । अब भैरों ठक्कर को संकोच होने लगा कि वह श्री जी को कहां छिपाएगा ? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था । अन्ततः उसने श्री जी को अब्बास बन्दर से जाने की स्वीकृति दे दी ।

भैरों ठक्कर ने श्री प्राणनाथ जी सहित सभी सुन्दरसाथ को बसरा (ईराक) जाने वाली नाव में बिठा दिया । भैरों ठक्कर और अन्य सुन्दरसाथ ने अपनी-अपनी क्षमतानुसार अधिक से अधिक वस्त्र, आभूषण और धन देकर उन्हें विदा किया ।

अब्बास बन्दर में श्री प्राणनाथ के आगमन पर, जिसका जैसा अंकुर था, उसने उतना लाभ लिया और उतनी ही उसे शोभा मिली । सब कुछ मूल स्वरूप श्री राज की आज्ञानुसार हो रहा था ।

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