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धारा भाई प्रसंग

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५१

धारा भाई खम्भालिया में अपने परिवार के साथ रहते थे ।

जब सूरजी भाई मस्कत से खम्भालिया आए, तब सुन्दरसाथ का बड़ा समागम हुआ और चर्चा होने लगी । उस समय अनेक लोग तारतम ज्ञान से प्रभावित होकर सुन्दरसाथ में शामिल हुए, जिसमें से एक धारा भाई का परिवार था ।

उस कार्यक्रम में धारा भाई के अन्दर श्री राज का आवेश आने लगा और दिन में ही सुन्दरसाथ को साक्षात् श्री राज के दर्शन होने लगे । धारा भाई के मुख से मूल स्वरूप श्री राज के सुन्दर स्वरूप और परमधाम की लीला का विस्तृत वर्णन होने लगा ।

जिस व्यक्ति पर श्री राज की कृपा होती है, सुन्दरसाथ तो श्रद्धावश उसकी सेवा करते ही हैं । सुन्दरसाथ ने धारा भाई को अक्षरातीत श्री राज का स्वरूप मानकर पूजना शुरु कर दिया । सुन्दरसाथ ने उन्हें आदरपूर्वक गादी पर बैठाया और सब उनकी सेवा करने लगे ।

जब यह बात बिहारी जी ने सुनी, तो उनके मन में बहुत रोष उत्पन्न हुआ । वे कहने लगे- "यह कैसी नयी राह चल पड़ी है ? वे सब सुन्दरसाथ तो माया में फंस गए हैं । इससे तो हमारे समाज की बदनामी हो जाएगी कि यह गोलों (शूद्रों) का पन्थ है । फिर कोई श्री देवचन्द्र जी द्वारा चलाए गए निजधाम के मार्ग का नाम नहीं लेगा ।"

तब बिहारी जी ने नागजी भाई को बुलाया और सूरजी भाई को पाती लिखवाकर तुरन्त नवतनपुरी आने का आदेश भेजा ।

बिहारी जी की पाती पढ़कर सूरजी भाई शीघ्रता से बिहारी जी के चरणों में पहुंचे । धारा भाई के प्रसंग के कारण वे मन ही मन डरे हुए थे । बिहारी जी के पूछने पर उन्होंने सारा वृत्तान्त सुना दिया कि किस प्रकार सुन्दरसाथ पर श्री राज की मेहेर हुई है और वे सब कितना आनन्दित हैं ।

सारी बात सुनकर बिहारी जी ने उनकी खण्डनी करी और कठोर शब्दों में कहा- "तुमको माया लग गई है और तुम्हारे घर में कलियुग शोर कर रहा है । तुम धारा भाई को परिवार सहित सुन्दरसाथ से निकाल दो । यदि वह सुन्दरसाथ में रहता है, तो हमारे-तुम्हारे बीच में परमधाम का कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा और हम तुमको सुन्दरसाथ से निकाल देंगे ।"

बिहारी जी के शब्द सुनकर सूरजी भाई का मन धारा भाई से टूट गया और वे बोले- "हम इन्हें सुन्दरसाथ में क्यों रखें, आखिर हमें बारह हजार में शामिल रहना है । आप हमसे परमधाम का नाता मत तोड़िएगा । हम आपके चरण नहीं छोड़ सकते । आपके आदेशानुसार हम धारा भाई के परिवार को समाज से बहिष्कृत कर देंगे ।"

नवतनपुरी से खम्भालिया आने के बाद, सूरजी भाई ने सुन्दरसाथ को राजी किया कि धारा भाई को परिवार सहित निकालना है।

तब धारा भाई की पत्नी बेनी बाई ने सब सुन्दरसाथ के आगे अर्ज करी- "हमारा क्या गुनाह है ? हमने कौन सा बुरा कार्य किया है, जो आप हमको सुन्दरसाथ और ग्राम से निकाल रहे हैं ?"

सुन्दरसाथ ने उत्तर दिया- "तुम लोगों को समाज में रखने की बिहारी जी की आज्ञा नहीं है । इसमें सुन्दरसाथ की मर्जी नहीं चलती । तुम बिहारी जी के पास जाकर अर्ज करो ।"

यह सुनकर धारा भाई का परिवार नवतनपुरी गया और बिहारी जी के चरणों में गिरकर रो-रोकर बहुत प्रार्थना करी, परन्तु उन्होंने कुछ भी ध्यान नहीं दिया ।

अन्त में निराश होकर धारा भाई और उनका परिवार वापस आ गया ।

अगला प्रसंग- नलिया में श्री जी और बिहारी जी की भेंट