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नलिया में श्री जी और बिहारी जी की भेंट

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५२

श्री जी साहिब जी ठट्ठानगर से चलकर नलिया पहुंच गए ।

जब धारा भाई ने यह बात सुनी, तो वे तुरन्त नलिया में श्री जी के चरणों में आ गए और उनको अपनी आपबीती सुनाई ।

सारा वृत्तान्त सुनाने के पश्चात् धारा भाई ने श्री जी से कहा- "मैंने तो आपके चरण पकड़ लिए हैं । अब आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें । मैं आपके हुक्म तले ही रहूंगा ।"

श्री जी ने धारा भाई को आश्वासन दिया कि वे बिहारी जी से इस विषय पर बात करेंगे ।

धारा भाई का बहिष्कार हुए एक वर्ष बीत चुका था । उनके साथ सूरजी भाई, हरजी भाई, थिरदास, जीवराज, और धारा भाई की बहन अजबाई भी श्री जी से विनती करने के लिए आए थे ।

श्री जी के साथ तेज बाई, रूपा बाई और राधा बाई भी थे, जिन्हें श्री जी की सेवा से लगाव था । इनके अतिरिक्त ठट्ठानगर से नाथा जोशी और खेमा भाई श्री जी को नलिया तक छोड़ने आए थे ।

इस समय श्री जी का दर्शन करने के लिए सूरत से भी आठ सुन्दरसाथ परिवार सहित आए हुए थे, जिनके नाम हैं- आकिल भगवान, नागजी नाहना, वल्लभ, धन जी, सुन्दर बाई, रतन बाई, मटा बाई, और लालो बाई ।

बिहारी जी नाव में बैठकर मंडई (माण्डवी) उतरे । उनके आने की सूचना लेकर धारा भाई भागते हुए श्री जी के पास गए और श्री जी को बधाई दी । यह सुनकर श्री जी बहुत प्रसन्न हुए और धारा भाई को आशीर्वाद देने लगे ।

तब धारा भाई ने कहा- "मैं आपसे यही आशीर्वाद चाहता हूं कि जब मैं बिहारी जी के चरणों में शीष झुकाऊं, तो वे मेरा प्रणाम स्वीकार कर लें और मुझे सुन्दरसाथ में शामिल कर लें ।"

बिहारी जी के साथ चार सुन्दरसाथ आए- संगजी, अखई, हरिवंश, और लाला ।

बिहारी जी के आने का समाचार मिलते ही सब सुन्दरसाथ उनका दर्शन करने के लिए दौड़ पड़े और आगे बढ़कर उनका स्वागत किया ।

श्री जी ने नलिया के कामदार से एक हवेली कुछ दिनों के लिए मांग ली थी । उसी हवेली में सब सुन्दरसाथ एकसाथ ठहरे और बिहारी जी की सेवा करने लगे ।

श्री जी ने बिहारी जी को अपनी पूरी बीतक सुनाई, जिसे सुनकर बिहारी जी मन ही मन हंसते हुए उनका उपहास करने लगे ।

सुन्दरसाथ का समागम एक स्थान पर हुआ था, अतः श्री जी चर्चा करने लगे । श्री जी की चर्चा सुनकर सब सुन्दरसाथ ने बहुत सुख पाया और उनके दिल के दुःख मिट गए । श्री जी की चर्चा से सबका चित्त माया से अलग हो गया । अब रसोई-उत्सव होने लगा और सुन्दरसाथ के मन में उमंग नहीं समा रही थी ।

श्री जी ने रूपा बाई और राधा बाई को एकान्त में बैठाकर समझाया- "तुम दोनों बिहारी जी को धाम धनी श्री राज मानकर सेवा करो । यदि तुम इनके आदेश का पालन करोगी, तो समझना तुमने मेरे सब कार्य सिद्ध कर दिए । यदि तुमने इनकी अवज्ञा करी, तो मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा ।"

श्री जी ने बिहारी जी के साथ पधारे सुन्दरसाथ को वस्त्र, आभूषण, बर्तन, आदि अनेक मूल्यवान पदार्थ भेंट किए । शेष सब सामग्री उन्होंने बिहारी जी के आगे रख दी । उन्होंने बिहारी जी को धाम का धनी मानकर श्री तेज कुंवरी के वस्त्र-आभूषण भी अर्पित कर दिए । अपने पास उन्होंने सिर्फ पहनने योग्य उतने ही कपड़े रखे, जितने आवश्यक थे ।

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