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शिवजी और रामजी का वृत्तान्त

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५५

शिवजी और रामजी दोनों सगे भाई थे और श्री देवचन्द्र जी के समय में सुन्दरसाथ में शामिल हुए थे ।

श्री जी ने उन दोनों को समझाया- "तुम दोनों गादीपति बिहारी जी का दर्शन करने के लिए नवतनपुरी जाओ । जब तक तुम उनके चरणों में प्रणाम नहीं करोगे, तब तक तुम्हारी आत्मा जाग्रत नहीं हो सकती ।"

श्री जी ने उन दोनों को पाती (पत्र) लिखकर दे दी ।

पहले शिवजी जामनगर पहुंचे और पाती देकर बिहारी जी के चरणों में प्रणाम किया । उन्होंने बिहारी जी को पांच मोहोर भेंट की, जिससे प्रसन्न होकर बिहारी जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनकी आत्मा निर्मल हो जाए ।

रामजी निर्धन थे । उनके पास भेंट करने के लिए धन नहीं था । जब वे जामनगर पहुंचे, तो न तो उनकी पाती स्वीकार की गई, न उन्हें अन्दर प्रवेश मिला, न ही उन्हें सुन्दरसाथ में बैठने दिया गया ।

रामजी भाई ने रो-धोकर बहुत विनती की और तीन दिन तक उपवास करते हुए बिहारी जी के द्वार पर बैठे रहे, परन्तु किसी ने उन पर दया नहीं दिखाई । यह देखकर उनकी आशा टूट गई ।

वापस लौटकर रामजी भाई ने श्री जी को पाती वापस कर दी और अपनी बीतक कह सुनाई । सब कुछ सुनकर श्री जी बहुत दुःखी हुए और उनके दिल में बिहारी जी के प्रति शंका और गहरी हो गई ।

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