सूरत में भीम भाई की जागनी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५६
जब श्री जी सूरत में चर्चा कर रहे थे, तब अब्बास बन्दर से गोवर्धन भाई आए । उन्होंने श्री जी और सब सुन्दरसाथ का सारा खर्च अपने ऊपर ले लिया और उसी में अपने जीवन को सफल समझा ।
श्री जी की चर्चा की ख्याति पूरे शहर में हो गई और बहुत लोग चर्चा सुनने के लिए आने लगे । वे अपने दिल में जो भी संशय लेकर आते, श्री जी के दर्शन से उनके संशयों का निवारण हो जाता ।
भीम भट्ट और श्याम भट्ट भी श्री प्राणनाथ जी के दर्शन करने आए । श्री जी की अनुपम चर्चा सुनकर वे दोनों उन पर फिदा हो गए । श्री जी के प्रेम में बंधकर वे नियमित रूप से आने लगे ।
वे दोनों सन्यासी शम्भूनाथ के शिष्य थे, जिनसे उन्होंने वेदान्त पक्ष का ज्ञान प्राप्त किया था, परन्तु उन्हें अन्य शास्त्रों का कोई ज्ञान नहीं था ।
जो आत्म तत्व की खोज करता है, उसके दिल में कोई विकार नहीं रहता और वह सबको आत्मिक भाव से ही देखता है ।
वे दोनों समझने लगे कि यहां तो सर्वदेशीय (सभी पक्षों की) चर्चा होती है, जिसे सुनकर सबको अचरज होता है । वेदान्त के विषय में तो उन्हें सब ज्ञात था, परन्तु उन्होंने अनुभव किया कि श्री जी की चर्चा तो वेदान्त से भी ऊपर है ।
अब वे दोनों विचार करने लगे कि श्री जी कौन सी अद्भुत राह बता रहे हैं ? इन बातों का चिन्तन करते-करते भीम भाई सब कुछ समझ गए ।
भीम भाई ने श्याम भाई से कहा- "हम लोग तो जगत में व्यापक स्वरूप को ब्रह्म समझते थे, परन्तु जब अक्षर की निद्रा भंग होती है तो स्वप्न के समान अनेक ब्रह्माण्ड लय हो जाते हैं । श्री जी तो अक्षर से भी परे की अखण्ड लीला का वर्णन कर रहे हैं, जिसकी सुधि ब्रह्माण्ड में किसी को भी नहीं है, ब्रह्मा, विष्णु, शिव और महाविष्णु को भी नहीं ।"
भीम भाई की दृष्टि खुल गई और उन्हें अखण्ड लीला का अनुभव होने लगा । तब उन्होंने अपने पहले गुरु से नाता तोड़ लिया और पूरे परिवार सहित श्री प्राणनाथ जी के चरणों में आ गए ।
अगला प्रसंग- गोविन्द व्यास के ४० प्रश्नों का उत्तर
