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विष से बचाने वाला मन्त्र

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७

एक दिवस हरिदास जी के पास कुछ लोग एक व्यक्ति को लेकर आये, जिसे बिच्छू ने डंक मार दिया था । विष के प्रभाव से उसका शरीर मृतप्राय हो गया था । देवचन्द्र जी भी वहां उपस्थित थे ।

हरिदास जी ने एक मन्त्र पढ़कर अपनी मूछों पर हाथ फेरा, तो उस व्यक्ति को कुछ आराम मिला । जैसे ही उन्होंने दूसरी बार मूछों पर हाथ फेरा, वह व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया । जब मन्त्र पढ़कर तीसरी बार उन्होंने मूछों पर हाथ फेरा, तो वह व्यक्ति पूरी तरह विषमुक्त और स्वस्थ हो गया । तब सभी लोगों ने हरिदास जी को धन्यवाद दिया ।

उन लोगों के जाने के बाद, हरिदास जी ने देवचन्द्र जी से कहा- "यह मन्त्र बहुत शक्तिशाली है, तुम इसे सीख लो । यदि इस व्यक्ति को लाने में एक घड़ी (साढ़े बाईस मिनट) की भी देरी हो जाती, तो इसके प्राण बचना सम्भव नहीं था, इसलिए यह मन्त्र परोपकार में सहायक है ।"

तब श्री देवचन्द्र ने कहा- "आपने जो मन्त्र मुझे पहले दिया था, उसे मैं अपने हृदय में रखता हूं । वह मन्त्र जन्म और मृत्यु के समय होने वाले लाख बिच्छुओं के काटने जैसे दुःख से बचाकर अखण्ड सुख देने वाला है । अब जिस हृदय में ऐसा अलौकिक मन्त्र रहता है, वहां यह सांसारिक मन्त्र कैसे समा सकता है ?"

हरिदास जी इस उत्तर से बहुत प्रसन्न हुए और देवचन्द्र जी की प्रशंसा करने लगे- "हे देवचन्द्र ! तुम्हारे जैसी अलौकिक बुद्धि मेरे पास नहीं है । जो बात तुमने कही है, ऐसा विचार तो मेरे मन में कभी आया ही नहीं ।"

इस प्रकार भोजनगर में श्री देवचन्द्र जी के तन से अनेक लीलाएं हुईं ।

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