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श्री देवचन्द्र द्वारा निष्ठाबद्ध गोपनीय सेवा

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ८

श्री देवचन्द्र जी ऐसे छिपाकर सेवा करते थे कि किसी को पता नहीं चलने देते थे ।

वे रात के १२ बजे तक हरिदास जी की संगति में चर्चा और कीर्तन करते रहते । फिर तीन घण्टे के लिए अपने घर जाते और रात्रि ३ बजे वापस आकर हरिदास जी के मन्दिर की परिक्रमा करने लगते । इस प्रकार वे अति कठोर कसनी करने लगे ।

एक दिन हरिदास जी देह कार्य के लिए रात्रि ३ बजे उठे । उन्होंने झरोखे से किसी को घूमते हुए देखा, तो आवाज लगाकर पूछा- "तुम कौन हो ?"

यह सुनकर देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "मैं हूं ।"

देवचन्द्र जी की आवाज पहचानकर हरिदास जी ने घर का दरवाजा खोल दिया और उनको अन्दर लेकर पूछा- "तुम इस समय क्यों आये हो ?"

अब श्री देवचन्द्र जी ने उत्तर दिया- "मुझे लगा कि दिन उगने वाला है, इसलिए मैं आ गया ।"

इस प्रकार श्री देवचन्द्र जी जो सेवा करते थे, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए उसे किसी के सामने दिखाते नहीं थे अर्थात् गोपनीय रखते थे ।

एक दिन हरिदास जी ने पुनः देवचन्द्र जी को ब्रह्म मुहूर्त में अपने घर की परिक्रमा करते हुए देख लिया ।

उन्होंने आवाज लगाकर देवचन्द्र जी को ऊपर बुलाया और कहा- "मैं पहले यही समझता था कि तुम एक बार गलती से रात्रि में आ गए होगे, परन्तु तुम तो प्रतिदिन मेरे घर की परिक्रमा करते हो । मैं तुम्हारी इस कसनी का बोझ नहीं सहन कर सकता । तुम जो चाहते हो मुझे बताओ, वह मैं तुम्हें दे दूंगा ।"

श्री देवचन्द्र के चुप रहने पर हरिदास जी ने कहा- "मैं तुम्हें बाल मुकुन्द की मूर्ति देता हूं । तुम उन्हें अपने घर ले जाओ और वहीं पर उनकी सेवा करके आनन्द पाओ ।"

श्री देवचन्द्र जी ने उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए कहा- "जैसी आपकी आज्ञा ।"

अगला प्रसंग- बाल मुकुन्द की मूर्ति अदृश्य हो गई