बाल मुकुन्द की मूर्ति अदृश्य हो गई
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९
श्री देवचन्द्र जी की सेवा से प्रसन्न होकर हरिदास जी ने उन्हें बाल मुकुन्द जी की मूर्ति देने का वचन दिया ।
जिस दिन मूर्ति देनी थी, जब उस दिन प्रातः हरिदास जी उठकर मन्दिर में सेवा करने गए, तो वहां बाल मुकुन्द की मूर्ति नहीं दिखी । उन्होंने सिंहासन, सेज्या, आदि हर जगह खोजा, परन्तु मूर्ति नहीं मिली ।
हरिदास जी ने दुःखी मन से परिवार के सदस्यों से पूछा- "यहां कोई आया तो नहीं था ?"
तब सब ने उत्तर दिया- "यहां आने का साहस किसमें है ?"
आश्चर्य में डूबे हुए हरिदास जी ने बांके बिहारी की सेवा की और फिर बाल मुकुन्द की मूर्ति खोजने लगे ।
इसी समय श्री देवचन्द्र जी आ गए । सारी बात सुनकर वे बहुत दुःखी हुए और हरिदास जी से कहा- "आप चिन्ता मत करिए, इसमें आपका कोई दोष नहीं है । जब आपने मुझे मूर्ति देने का संकल्प किया था, ऐसा मानना चाहिए कि तभी वह मुझे प्राप्त हो गई । अवश्य मेरी किसी भूल के कारण ही मूर्ति अदृश्य हुई और मुझे निराशा प्राप्त हुई ।"
श्री देवचन्द्र के दिलासा भरे वचन सुनकर भी हरिदास जी को सन्तोष नहीं हुआ । हरिदास जी ने प्रण किया- "जब तक मुझे बाल मुकुन्द की मूर्ति के दर्शन नहीं होते, तब तक मुझे करार नहीं मिलेगा और न ही मैं तब तक भोजन ग्रहण करूंगा ।"
हरिदास जी ने दैनिक नियमानुसार बांके बिहारी को बाल भोग (नाश्ता) तथा राज भोग (दोपहर का भोजन) लगाया, और बाल मुकुन्द को लगने वाला भोग सम्भाल कर रख लिया । हरिदास जी, उनके परिवार के सदस्य, और देवचन्द्र जी में से किसी ने भी पूरा दिन भोजन नहीं किया ।
हरिदास जी पूरा दिन दुःखी मन से बैठे रहे । जब इसी अवस्था में बैठे-बैठे रात बीत गई, तब उन्हें थोड़ी निद्रा आ गई । उसी समय साक्षात् बाल मुकुन्द जी ने उन्हें दर्शन दिया ।
साक्षात् बाल मुकुन्द को आया देखकर हरिदास जी ने कहा- "हे प्रभु जी ! आप कहां चले गये थे ? आपको ढूंढते-ढूंढते हम बहुत दुःखी हो गए ।"
बाल मुकुन्द जी ने कहा- "हम तो वहीं बैठे थे ।"
तब पुनः हरिदास जी बोले- "तो फिर आप मुझे दिखाई क्यों नहीं दिए ?"
बाल मुकुन्द जी ने उत्तर दिया- "तुम मुझे देवचन्द्र जी के घर पर पधरा रहे थे, इसलिए मैं अदृश्य हो गया था । तुम्हें देवचन्द्र जी के स्वरूप की पहचान नहीं है । मैं उनकी सेवा या एहसान सहन नहीं कर सकता, इसलिए मेरी मूर्ति उन्हें मत देना । यदि देवचन्द्र जी दुःखी हों, तो उन्हें बांके बिहारी के वस्त्रों की सेवा दे देना ।"
हरिदास जी ने पूछा- "अब प्रभु जी आप कहां रहेंगे ?"
बाल मुकुन्द जी ने उत्तर दिया- "मैं उसी स्थान पर रहूंगा ।"
इसी दौरान हरिदास जी की आंखें खुल गयीं । उन्होंने मन्दिर में जाकर देखा, तो बाल मुकुन्द की मूर्ति सिंहासन पर उपस्थित थी । यह देखकर उनका मन बहुत प्रफुल्लित हुआ और वे बार-बार बाल मुकुन्द के चरणों में झुककर प्रणाम करने लगे ।
साक्षात्कार की खुशी में, हरिदास जी उसी समय देवचन्द्र जी को सूचना देने घर से निकल पड़े । मार्ग में बाजार में देवचन्द्र जी मिल गये । उन्हें देखते ही हरिदास जी ने जल्दी से उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया ।
देवचन्द्र जी ने उन्हें ऊपर उठाया और कहा- "आप यह क्या कर रहे हैं ?"
तब श्री हरिदास जी ने कहा- "हे देवचन्द्र जी ! मैं आपको क्या बताऊं ? आज तक मुझे आपके स्वरूप की पहचान नहीं थी । इतने वर्षों से मैं प्रभु की सेवा कर रहा था, परन्तु कभी भी उनका साक्षात् दर्शन नहीं हुआ । आज बाल मुकुन्द जी ने साक्षात् दर्शन देकर मुझे आपके स्वरूप की पहचान करवा दी ।"
फिर उन्होंने देवचन्द्र जी को सारी बातें विस्तार से बतायीं ।
तब श्री देवचन्द्र जी ने पूछा- "क्या आपको बाल मुकुन्द की मूर्ति मिल गई ?"
हरिदास जी ने उत्तर दिया- "चलिए, आपको भी दर्शन करवाता हूं ।"
इस प्रकार दोनों व्यक्ति आनन्दित मन से बातें करते हुए घर आ गये । बाल मुकुन्द की मूर्ति का दर्शन करने के बाद सभी लोगों ने भोजन ग्रहण किया ।
अगला प्रसंग- घर पर बांके बिहारी के वस्त्रों की सेवा
