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मोमिनों की औरंगज़ेब से भेंट

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९४

बारह मोमिनों ने आपस में विचार किया- "हम लोग जुम्मे की नमाज के समय जामा मस्जिद जाएंगे । वहां जाकर मुहम्मद की सिफत (प्रशंसा) वाली सनन्धें पढ़ेंगे । तब उन लोगों में शोर मच जाएगा और बात सुल्तान तक पहुंच जाएगी । फिर सुल्तान के बुलाने पर हम उसको इमाम महदी का पैगाम सुना देंगे ।"

यह विचार करके १२ मोमिन मस्जिद में जाकर खड़े हो गए और जोश में सनन्ध की चौपाइयां गाने लगे ।

जामा मस्जिद के इमाम ने जब उन्हें परवरदिगार की महिमा गाते सुना, तो वह ऊपर से उतरकर आ गया । इमाम महदी का नाम सुनकर और मोमिनों के जोश भरे मुख देखकर, वह बहुत खुश हुआ ।

वह आसमान की तरफ देखकर कहने लगा- "यह हक सुभान की बहुत रहमत (कृपा) हुई । मैं आप लोगों को सुल्तान के पास लेकर जाऊंगा और उनसे आपकी बात कहूंगा ।"

फिर वह इमाम मोमिनों का हाथ पकड़कर उन्हें औरंगज़ेब के महल तक ले गया । मोमिनों को एक स्थान पर खड़ा करके, वह महल के अन्दर चला गया ।

अन्दर जाकर उसने बादशाह से कहा- "इमाम महदी का पैगाम आया है । मैं उनके लोगों को लेकर आया हूं । आप उनसे मिल लीजिए ।"

यह बात सुनकर सुल्तान औरंगज़ेब अपने महल से निकलकर बाहर आ गया और चबूतरे पर खड़ा हो गया । उसके हाथ में एक छड़ी थी और वह मोमिनों की बात सुनने लगा ।

सभी १२ मोमिन नीचे चबूतरे के पास जाकर खड़े हो गए । उन्हें देखकर दरबारियों में खट-पट शुरु हो गई । सुल्तान ने मोमिनों को इशारा करके उनके आने का कारण पूछा ।

मोमिनों ने उत्तर दिया- "ला इलाह इल्लिल्लाह, मुहम्मद रसूल अल्लाह ।"

सुल्तान ने फिर संकेत से पूछा- "तुम क्या चाहते हो ?"

सुन्दरसाथ ने उत्तर दिया- "हम दीन इस्लाम के आशिक हैं ।"

सुल्तान ने पुनः कहा- "अपना मतलब बताओ । मुझसे कुछ चाहते हो, तो मांग लो ।"

सुन्दरसाथ ने कहा- "हम एक बात मांगते हैं कि आपसे रूबरू (आमने-सामने) बात करने का मौका मिले । जब हमारी बात हो, तब कोई बीच में न आए । आप हमसे जो चाहे पूछिए या सुनिए, परन्तु हम किसी और से बात नहीं करना चाहते ।"

सुल्तान ने फिर पूछा- "कुछ और चाहिए हो तो बताइए ?"

सुन्दरसाथ ने उत्तर दिया- "हम पहले ही कह चुके हैं कि हमें मुर्दार चीजों (लौकिक वस्तुओं) की कामना नहीं है ।"

यह सुनकर सुल्तान औरंगज़ेब ने तीन बार अपनी छड़ी को चूमा ।

तब सुन्दरसाथ जोश में बोले- "हमने ही मस्जिद के गुसलखाने पर रुक्का चिपकाया था । आपको पैगाम देने के लिए हमने काज़ी शेख इस्लाम, शेख निज़ाम, रिज़वी खान, सिद्दीक फौलाद, और आकिल खान को नलुए भेजे थे । आकिल खान ने तो नलुआ लेने से ही मना कर दिया ।"

सुल्तान के आगे खड़ा शेख सुलेमान डर के मारे कांपने लगा कि कहीं सुन्दरसाथ उसकी शिकायत न कर दें ।

तब सुल्तान ने पूछा- "क्या आपके पास कोई किताब है ?"

मोमिनों ने कहा- "हम शीघ्र मंगवा देते हैं ।"

पुनः सुल्तान ने कहा- "कुछ मांगिए ।"

मोमिनों ने कहा- "हम मुहम्मदी दीन के अलावा कुछ नहीं चाहते ।"

मोमिन अपने ईमान के जोश में बोल रहे थे, जिसे देखकर बादशाह के दिल में डर बैठ गया । मोमिनों के कठोर शब्दों को सुनकर दूर खड़े सभी दरबारी कांप रहे थे ।

इसी बीच बादशाह के दरबारियों ने उसे सूचना दी कि इनमें से दस लोग हिन्दू हैं और दो मुस्लिम हैं । तब बादशाह ने संकेत किया- "इन्हें सिद्दीक फौलाद के घर पहुंचा दो ।"

यह सुनकर मोमिन चिंतित हो गए ।

अगला प्रसंग- मोमिनों को कैद में डाला