Kuljam.org

विषय-सूची

औरंगज़ेब ने मोमिनों को कैद में डाला

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ९५

बादशाह औरंगज़ेब के हुक्म से सिपाहियों ने मोमिनों को कोतवाल सिद्दीक फौलाद के पास पहुंचा दिया ।

सिपाहियों ने कहा- "आज तक किसी ने भी सुल्तान के सामने ऐसे सख्त शब्दों में बात करने की हिम्मत नहीं की । इन्होंने बात करते समय किसी की परवाह नहीं की और इनकी बातें सुनकर सभी दरबारी कांप रहे थे ।"

बाद में बादशाह ने सिद्दीक फौलाद को सन्देश भेजा- "तुम इनसे अच्छी तरह पूछताछ करो कि वास्तव में ये कौन हैं ? इन्हें अपने पास ही रखना और इनके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखना । इन्हें कोई दुःख नहीं पहुंचना चाहिए । मैं इन्हें तुमको सौंप रहा हूं ।"

इस समय दिल्ली के घर-घर में हलचल मच गई । बारह मोमिनों के परिवार वाले बहुत डर गए । दयाराम के घर में बहुत शोर मचा । उनके घरवाले दयाराम के बदले किसी अन्य को पहुंचाने के लिए भी तैयार थे ।

जब कोतवाल ने मोमिनों से खाने-पीने के विषय में पुछवाया, तो सभी बारह सुन्दरसाथ ने दृढ़ता से एकमत होकर शाकाहारी भोजन मांगा । काज़ी शेख इस्लाम ने भी उनके भोजन के विषय में जानकारी प्राप्त की ।

काफिरों (धर्म से भ्रष्ट लोगों) ने सुल्तान के मन में मोमिनों के प्रति संशय पैदा कर दिया- "आपको इन लोगों से रूबरू बात नहीं करनी चाहिए । क्या पता किसी दुश्मन ने साजिश रचकर इन्हें भेजा हो ? आप उनकी बात किसी गुलाम (सेवक) से करवा सकते हैं । जब उन पर ऐतबार (विश्वास) हो जाए, तब बाद में सोचा जा सकता है । अगर शाहजहां के अमल (शासन) में कोई इस तरह उत्पात मचाता, तो उसी समय उनकी गर्दन कटवा दी जाती और उनकी कोई बात भी न सुनी जाती ।"

बादशाह औरंगज़ेब को तो इमाम महदी को देखने की इच्छा थी, इसलिए उसने किसी की चुगली पर ध्यान नहीं दिया और उनकी बातों को नकार दिया । औरंगज़ेब ने मोमिनों से आमने-सामने बात करने का मन बना लिया था, परन्तु उससे पहले उनकी वास्तविकता जानने के लिए उसने जिस व्यक्ति को भेजा वह महादुष्ट निकला ।

उस व्यक्ति ने एकान्त में मोमिनों को कसाला (कष्ट) देकर श्री जी साहिब जी का पता जानना चाहा । उसकी बातों से मोमिन सतर्क हो गए और किसी ने भी श्री जी के स्थान की जानकारी नहीं दी ।

अगला प्रसंग- अवज्ञाकारियों पर रोष