सुन्दरसाथ
धाम की आत्माओं या ब्रह्मसृष्टियों को "साथ" कहते हैं । उन्हें प्रेम से "सुन्दरसाथ" या आदर से "साथ जी" भी कहते हैं ।
सुन्दरसाथ का एक-दूसरे के प्रति व्यवहार
इन्द्रावती जी के कथनों से यह समझने का प्रयास करते हैं कि साथ को एक-दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए-
जिस जिह्वा से मैं (सखियों के लिए) दुःख कहूं, उसके मैं शत (सौ) टुकड़े कर दूं । यदि मेरी सैयन को दुःख है, तो मुझे सुख कैसे हो सकता है ? हम तुम एक वतन (धाम) के हैं और हमारी आत्मा दो नहीं है (एक स्वरूप है) ।1
अब मैं साथ को अकेला नहीं छोड़ूंगी और साथ भी मुझे नहीं छोड़ेंगे । मेरी बात (वाणी) का साथ उल्लंघन नहीं करते और जैसा साथ कहते हैं मैं वैसा करती हूं ।2
(1) कलस हिन्दुस्तानी 11/32,33 (2) कलस हि. 21/17
