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विषय-सूची

ब्रह्मसृष्टि

अक्षरातीत का अंग और उनके धाम में निवास करने वाली आत्मा को ब्रह्मसृष्टि कहते हैं । ब्रह्मसृष्टि को सुहागनी, प्यारी, विरहणी, सखी, सैयां, आदि भी कहा गया है ।

जो कोई ब्रह्मसृष्टि हैं, उनमें पूर्ण प्रेम होता है और उनकी दृष्टि प्रियतम (श्री राज) पर लगी रहती है ।1

परब्रह्म के साथ ब्रह्मसृष्टियों का संसार में दो बार आगमन हुआ । पहली बार उन्होंने ब्रज लीला और रास लीला करी । दूसरी बार उनके द्वारा जागनी लीला की गई, जो वर्तमान में भी चल रही है । ब्रह्मसृष्टियों की संख्या 12000 बताई गई है ।

सभी आत्माएं (ब्रह्मसृष्टियां) सदा ही एक (समान) हैं और उनके हृदय भी एक (समान) हैं ।2

ब्रह्मसृष्टियों की पहचान

कलस हिन्दुस्तानी के प्रकरण 11 में ब्रह्मसृष्टियों की पहचान बताई गई है, जिसका कुछ अंश यहां दिया जा रहा है-

संसार से परे निजधाम की जो सुहागनियां (ब्रह्मसृष्टियां) हैं, उनकी कुछ पहचान बताती हूं । यदि वे अपने घर को भूल भी जाएं, तो भी अन्ततः उनकी नजर (ध्यान) वहीं रहती है ।

वे प्रियतम की प्यारी आशिक हैं । उन विरहणियों में (प्रियतम के लिए) प्रेम होता है । उनमें (प्रियतम से मिलने का) दर्द होता है । यह सुहागनियों (ब्रह्मसृष्टियों) के लक्षण हैं ।

वे (प्रियतम के बिना) एक पल भी श्वांस नहीं ले सकतीं, परन्तु ऊपर से किसी को ऐसा दिखाती नहीं । यह बात प्यारी या प्रियतम ही जानते हैं । इस प्रकार उन (ब्रह्मसृष्टियों) के अनेक लक्षण हैं ।

सुहागनियों का यकीन (विश्वास) नहीं छूटता, भले ही अनेक विघ्न (संकट) पड़ जाएं । प्यारी अपने प्रियतम के लिए अपने जीव को यत्न (बचाने की परवाह) नहीं करती ।

सुहागन निर्गुण होकर (सादगी से) रहती हैं और उनका आहार भी निर्गुण (सात्विक) होता है । उनका दिल साफ (पवित्र) होता है और वह कभी किसी को दुःख नहीं देतीं ।

वे अपने आप (परात्म) को, अपने मूल घर (धाम) को, अपने खसम (प्रियतम श्री राज) को और आखिर के दिन (जब संसार से मुक्त होकर धाम जाएंगी) को खोजती रहती हैं ।

सुहागनियां खोज करने से तब तक नहीं थकतीं, जब तक पार के पार के पार (अक्षरातीत) को न पा लें । वे नित्य खोज करते हुए (आत्म-जाग्रति की) सीढ़ी चढ़ती जाती हैं और इस विषय में नए-नए विचार करती हैं ।

वह (ब्रह्मसृष्टि) तो पहले से अन्दर से उजली (निर्मल) है और पल-पल उसके अन्दर (ज्ञान का) उजाला बढ़ता जाता है । वह अपनी देह की चिन्ता नहीं करती, उसे सिर्फ प्रियतम से मिलने की आशा होती है ।

जब प्रियतम जाहिर हो गए, सुहागन उनका विरह नहीं सह सकती । सुहागन प्रियतम का अंग है और प्रियतम सुहागन का जीवन है ।

जब खसम की सुधि मिलती है, तब सुहागन (माया में) रह नहीं सकतीं ।

जो इस घर (धाम) के अंकुर वाली सैयां (ब्रह्मसृष्टि) होंगी, उनका यह लक्षण है कि धाम के वचन सुनकर वे तत्परता से (प्रियतम के चरणों में) आती हैं ।3

संसार में ब्रह्मसृष्टि की स्थिति

(ब्रह्मसृष्टियों पर) माया का तीव्र नशा चढ़ा है । छलमयी संसार में वे अपने आप (असल स्वरूप) को भूल गई हैं । न तो उन्हें प्रियतम (श्री राज) की सुध है और न ही उनके पास मूल (धाम) की बुद्धि है । इस मोहजल का ऐसा बल है ।4

(श्री राज ने इन्द्रावती जी से कहा-) सुहागनियां (ब्रह्मसृष्टियां) संसार में दुःखी हो रही हैं, यह मुझसे सहा नहीं जाता । मैं भी जाहिर हो जाऊंगा, परन्तु अभी तुम सुहागनियों को जगाओ ।5

ब्रह्मसृष्टियों के प्रेम की परीक्षा

इस संसार में ब्रह्मसृष्टियों की परीक्षा है कि वे अपने प्रियतम अक्षरातीत श्री राज से कितना प्रेम करती हैं । इसी बात को कलस हिन्दुस्तानी में इन शब्दों में व्यक्त किया गया है-6

मैं तुमको सावधान करती हूं कि यही तुम्हारी कसौटी है । इस प्रकार खसम सभी सैयन (सखियों) की परीक्षा ले रहे हैं ।

जो हुकम को शिरोधार्य करके अपने अंग को मरोड़कर (माया की निद्रा को त्यागकर) नहीं उठी, तो प्रियतम और सैयां सब देख रहे हैं कि तुम्हारे प्रेम में कितना बल है ।

जो (इन वचनों को) सुन कर (प्रियतम को पाने के लिए) दौड़ी नहीं, तो उन पर हंसी होगी । जिन में जैसा इश्क है, सो अब जाहिर हो जाएगा ।

जो इश्क लेकर (प्रियतम से) मिलेगी, सो अपार सुख लेगी । जिसमें दर्द (विरह) नहीं होगा, उसे दुःख होएगा, सो निश्चित जानो ।

यदि किसी ने गफलत (असावधानी) करी और अपना दिल देकर जागी नहीं, सो यहां लोक (जागनी लीला) एवं अलोक (दर्शन, प्रेम व आनन्द) का कुछ भी लाभ नहीं ले सकेगी ।

(वह सखी) लाभ तो नहीं ले सकेगी, परन्तु (धाम में) सबके सामने उसकी हंसी होगी । हे सुहागन ! अब यह हंसी तो कोई मत कराओ ।

ब्रह्मसृष्टियों को प्रबोध

यह झूठी (माया) तुमको लग रही है और तुम इस झूठी से लग रहे हो । यह झूठी अब उड़ जाएगी, परन्तु तुमको झूठा दाग (कलंक) दे जाएगी (कि तुम माया में फंस गए थे) । (धाम में तुम्हारी) अति बड़ी हंसी होगी । इसके लिए मुझे दोष न देना क्योंकि मैं तो तुम्हें कहने (समझाने) में कमी नहीं कर रही हूं, परन्तु छल (माया) का आवरण तुम्हारे सिर (बुद्धि) पर पड़ गया है ।7

तुमने खसम से यह छल (संसार) देखने को मांगा था । यदि तुम इस छल में भूली रही, तो फिर यह दिन (अवसर) नहीं आएगा । (ऐसी सखियां) यहां से दुःख लेकर चलेंगी और दूसरी बार यहां आना भी नहीं होगा । जो (संसार में) प्रियतम से मुख फेर कर बैठी हैं, उनका मुख (धाम में) ऊंचा कैसे होएगा ?8

तुम्हारा मुख सब सैयां (सखियों) के सामने (लज्जा से) नीचा होगा । कोई सैयां सत ठौर (धाम) में ऐसी हंसी न कराओ ।9

ब्रह्मसृष्टियों के लिए मार्गदर्शन

तू हाथी के समान पाखर (मेहेर रूपी कवच) पहनकर घण्टा बजाते हुए (निश्चिन्त होकर) चल । अपने को सिकोड़ कर इतना छोटा (अहंकार रहित) कर ले कि सुई के छिद्र में घुस सके । भूल मत और अपने शरीर को न्यौछावर कर दे, दौड़ कर पहाड़ पर चढ़ और छलांग लगा दे (अपनी समस्त सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके प्रियतम पर अपना जीवन समर्पित कर दे) ।10

(जागनी का) सुख लेने का यही समय है, बाद में तो सारी दुनिया (जीव) एकत्रित हो जाएगी ।11

ब्रह्मसृष्टि की महिमा

प्रियतम को सुहागनियां (ब्रह्मसृष्टियां) इतनी प्यारी हैं कि इसे जिह्वा से कहा नहीं जा सकता ।12

अनेक लोग बन्दगी (भक्ति) करते हैं और अनेक लोग विरह भी लेते हैं, परन्तु जो सुख हम (ब्रह्मसृष्टियों) को जाग्रत करके देते हैं, वह उन्हें सपने में भी नहीं मिलता ।13

ब्रह्मसृष्टि का ऐसा नूर (महिमा) है कि जो दुनिया अंकूर (बेहद में मूल तन) के बिना थी, उनके लिए नए अंकूर बनाकर उन्हें अपनी कृपादृष्टि से अखण्ड मुक्ति दे दी ।14



(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/27 (2) कलस हिन्दुस्तानी 20/12 (3) कलस हि. 12/5 (4) प्रकास हि. 37/88 (5) कलस हि. 9/31 (6) कलस हि. 11/24-28 (7) कलस हि. 12/12,13 (8) कलस हि. 12/14,16 (9) कलस हि. 12/15 (10) कलस हि. 3/6 (11) कलस हि. 10/20 (12) कलस हि. 9/27 (13) कलस हि. 9/28 (14) प्रकास हि. 37/109