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विषय-सूची

मेहेर या दया

यहां परब्रह्म की कृपा को मेहेर या दया कहा गया है । उनकी कृपा असीम है, इसलिए उसे सागर के रूप में भी वर्णित किया जाता है ।

अब तो मेरे प्रियतम (श्री राज) की दया इस ब्रह्माण्ड में समाती नहीं है । मैं इस गुण को कैसे भूल गई कि उन्होंने मेरे द्वारा सबको अखण्ड करवाया (मुक्ति दिलवायी) । हे सुहागनियों ! प्रियतम की दया के गुण को मैं कैसे कहूं ?1

मेरे सिर पर प्रियतम की दया का मुकुट और छत्र है तथा दया के चंवर ढुलाए जा रहे हैं । उन्होंने मुझे दया के सिंहासन पर (अक्षरातीत बनाकर) बैठा दिया है । मेरे सभी अंगों में उनकी पूर्ण दया है । यह सब दया का ठाट (वैभव) है ।2

अब प्रियतम की दया के गुण के विषय में तो मैं तब कहूं, जब हम दोनों में कुछ अन्तर हो । उन्होंने (इस खेल में) मुझे अपनी अंगना के रूप में स्वीकार कर लिया है, जिसे सब साथ देख रहे हैं ।3

दया तो पल-पल पसरती (बढ़ती) जाती है और इसका कोई पार नहीं मिलता । दूसरा सब कुछ तो मैंने माप लिया, परन्तु दया का कोई निर्णय नहीं हो सकता ।4

मेहेर सागर

अक्षरातीत श्री राज के हृदय के आठवें सागर के रूप में मेहेर सागर का वर्णन किया गया है, जिसकी मूल चौपाइयां सागर ग्रन्थ में वर्णित हैं ।



(1) कलस हिन्दुस्तानी 21/1 (2) कलस हि. 21/3 (3) कलस हि. 21/4 (4) कलस हि. 21/5