श्री जी दिल्ली से उदयपुर आए
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १००
सुन्दरसाथ से स्वीकृति मिलने के बाद श्री जी साहिब जी कामा पहाड़ी (दिल्ली) से आमेर (जयपुर) आ गए । एक-दो दिन आमेर में रहने के बाद वे सांगानेर (जयपुर) आए ।
मुकुन्द दास संयोगवश उदयपुर से सांगानेर में ज्ञान प्रचार करने के लिए आए थे । वहां उन्हें पता चला कि दिल्ली में सुन्दरसाथ ने किस प्रकार शरीयत से संघर्ष किया । यह जानकर वे आमेर पहुंचे । जब उन्हें पता चला कि श्री जी सांगानेर पहुंच गए हैं, तो वे वापस सांगानेर आ गए ।
जब मुकुन्द दास सांगानेर लौट रहे थे, तब मार्ग में उनकी भेंट शेख बदल से हो गई । अब वे दोनों मिलकर साथ-साथ चलने लगे । मार्ग में मवासियों ने उनका धन लूटने के लिए उन्हें मारने का विचार बना लिया । यह जानकर दोनों डरकर वहां से भाग निकले और पुर नामक गांव में पहुंच गए ।
पुर गांव में उन्होंने एक दुकान पर श्री जी साहिब जी को एक खाट पर बैठे देखा । छबीलदास और मलूकचन्द उनके साथ खड़े थे । दोनों भूख की पीड़ा के कारण दुःखी थे । श्री जी सहित दोनों सुन्दरसाथ दिल्ली से लगभग २५० कि.मी. की लम्बी यात्रा करके कई दिन में यहां पहुंचे थे और उनके पास भोजन करने के लिए भी पैसे नहीं थे ।
शेख बदल ने श्री जी के चरणों में प्रणाम किया । मुकुन्द दास भी आकर मिले । मुकुन्द दास के पास चार सौ रुपये थे । उन्होंने बाजार से खाने की वस्तुएं मंगाकर सबको भोजन करवाया । शेख बदल की थैली में तीन सौ रुपये थे । उन्होंने अपने सारे रुपये श्री जी के चरणों में रख दिए और श्रद्धापूर्वक बातें करने लगे ।
रात में मुकुन्द दास ने श्री जी से बात की । दिल्ली में सुन्दरसाथ के साथ हुए दुर्व्यवहार के लिए उनके मन में दुःख था । अब वे श्री जी के मन की बात पूछने लगे कि इस विषय में उनके क्या विचार हैं ?
प्रत्युत्तर में श्री जी ने कहा- "अब मैं इन शरीयतपन्थी लोगों को नहीं छोड़ूंगा । कोई अन्य इलाज करके इनकी जड़ (नींव) को उखाड़ दूंगा ।"
श्री जी के मन में अपार साहस देखकर मुकुन्द दास ने पूछा- "अब आप यहां से कहां जाएंगे ? यहां जरगा पन्थ के लाखों अनुयायी हैं । यह धनी बाबा का पन्थ है और उनके ग्रन्थ में अपनी साक्षियां भी हैं ।"
यह बात सुनकर श्री जी ने मुकुन्द दास को हुक्म दिया- "तुम उनसे बात करके देखो और अगर उनमें श्रद्धा दिखे तो मुझे वहां बुला लेना ।"
श्री जी की आज्ञा पाकर जब मुकुन्द दास और मलूक चन्द वहां से चले, तब भील उन पर टूट पड़े और उन्होंने भागकर अपने प्राण बचाए ।
मुकुन्द दास उदयपुर में लाधू मसानी के घर गए और उन्हें चर्चा सुनाई। लाधू मसानी सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । मुकुन्द दास ने उन्हें श्री जी साहिब जी के अलौकिक व्यक्तित्व के बारे में बताया और उनके दर्शन करने के लिए प्रेरित किया । तब लाधू मसानी ने रहने की व्यवस्था करके, मुकुन्द दास के माध्यम से, श्री जी को सुन्दरसाथ सहित आमन्त्रित किया ।
इस समय खम्भात से वनमाली दास, राम बाई और गोदावरी श्री जी के पास पहुंचे और इन्होंने अपना तन-मन-धन श्री जी के चरणों में समर्पित कर दिया । अब सुन्दरसाथ का मेला एकत्रित होने लगा, जिससे सबके मन में प्रसन्नता थी ।
श्री बाई जी कुछ महिलाओं के साथ आगरा में थीं । श्री जी के आदेश से मुकुन्द दास वहां गये और उन्हें दिल्ली का पूरा समाचार दिया । फिर श्री बाई जी सहित सभी सुन्दरसाथ श्री जी के पास आ गए और वहां से उदयपुर के लिए प्रस्थान किया । उनके जाने के बाद दज्जाल (सांसारिक लोगों) ने बहुत शोर किया (तरह-तरह की बातें कीं)।
उदयपुर में लाधू मसानी द्वारा हवेली दिए जाने पर श्री जी सब सुन्दरसाथ सहित पधारे । वहां चर्चा होने लगी, जिसमें श्री राज के बिना अन्य कोई बात ही नहीं होती थी ।
अगला प्रसंग- उदयपुर में जागनी
