उदयपुर में जागनी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०१
उदयपुर में श्री जी साहिब जी की चर्चा का समाचार जहां तक फैला, सब लोग उनका दर्शन करने एवं चर्चा सुनने आने लगे । वेद और कतेब की चर्चा सुनकर सबको बहुत शान्ति मिलती थी । अनेक नए लोग सुन्दरसाथ में शामिल हुए । श्री जी का दर्शन करके सुन्दरसाथ का चित्त बहुत प्रसन्न होता था ।
दो राजपूतों ने निकट की हवेली में बैठे-बैठे श्री जी की चर्चा सुनी, तो उन्हें भी तारतम ज्ञान की कुछ पहचान हो गई । इसी दौरान नूर मुहम्मद की श्री जी से भेंट हुई । उसने बहुत ध्यान से चर्चा सुनी और वह पूर्णतः समर्पित हो गया । एक दिन बारात में जा रहे एक सैय्यद ने श्री जी के मुख से चर्चा सुन ली, तो वह मोमिनों की रहनी से प्रभावित होकर ईमान ले आया ।
इनके अतिरिक्त सुन्दरसाथ में शामिल होने वाले अन्य लोगों के नाम हैं- भीखू सोनी, राधा, रुक्मणि, सुन्दर, सोना, मयाराम, वासुदेव, शुकदेव, देरासरी, जगीशा, अमोला, आदि । इन सब पर श्री राज की मेहेर उतरी । जिसका हाथ धाम धनी पकड़ लेते हैं, सिर्फ वे ही उनकी चर्चा और उत्सव में भाग ले पाते हैं ।
इस समय इनायत खान नामक पठान सौदागर, मुराद खान, अब्दुल नबी, अलादाद खान, यार खान, इलियास खान, नवाबकर और मिहीन को श्री जी के स्वरूप की पहचान हुई । उस्मान, हसन खान और अहमद खान भी श्री जी के दीदार के लिए आए ।
जब अव्वल खान घोड़े पर सवार होकर जा रहा था, तब राह में उसे श्री जी का दीदार हुआ ।
अव्वल खान ने नूर मुहम्मद से पूछा- "उस वैरागी की क्या हकीकत है ? अगर तुम मुझसे छिपाओगे, तो मैं न्याय के दिन तुम्हारा दामन पकड़कर हिसाब मांगूंगा । मुझे बताओ कि यह कैसा फकीर है, कौन है और कहां से आया है ?"
नूर मुहम्मद ने उत्तर दिया- "ये दीन-ए-इस्लाम में शामिल हैं । इनके पास कलमा और कुरान की हकीकत है, और इन्होंने दीन (धर्म) के काम के लिए कमर बांध रखी है ।"
अव्वल खान तो हकुल आकीन था, अर्थात् सुनकर ईमान लाने वाला मोमिन था । वह लौटकर श्री जी साहिब जी के दीदार के लिए आया और श्री जी ने उस पर कृपा करके अपने स्वरूप की पहचान करवा दी । अव्वल खान जोश में अपने हाथ में चाबुक लेकर स्वयं को पीटने लगा । तब श्री जी ने मना किया और उसे अपने पास बैठा लिया ।
वहां पट (परमधाम के चित्रण) का काम चल रहा था और श्री जी लिखवा रहे थे । मुकुन्द दास ने इस कार्य की जिम्मेदारी ले रखी थी ।
तभी कुछ पठान मिलकर श्री जी का दीदार करने आए और उनसे बातचीत होने लगी । उन्होंने कहा- "यदि आप रसूल का कलमा कह दें, तो हम आपके हो जाएंगे ।"
इस समय श्री जी के अन्दर जिब्रील (जोश) ने जोर किया और वे बोले- "मेरे और मुहम्मद के बीच में कोई अन्य कैसे आ सकता है ? यह बहुत अफसोस की बात है ।"
तभी वहां बैठे अव्वल खान की आत्मा पर जिब्रील ने जोर किया । उसका जोश देखकर पठान डर गए । वे सब खड़े हो गए और जाने के लिए विदा मांगी । घर जाकर उन्होंने शोर किया और मोमिनों की निंदा करने लगे ।
राणा के दिल में श्री जी के प्रति शक बना रहा, जबकि अव्वल खान मुस्लिम होते हुए भी उन पर ईमान ले आया । इसी कारण राणा उससे मजाक करने लगा कि इन्हें तो पूरी पहचान हो गई है ।
इस समय सबसे पहले अमरा भाई सुन्दरसाथ में शामिल हुए । उनकी संगति में रहने से रामसिंह गंगा को भी श्री जी की कुछ पहचान हो गई । भोगी दास श्री जी का दर्शन करने आए थे । उन्हें चर्चा बहुत मीठी लगी और उन्होंने श्री जी के रूप में परब्रह्म को पहचान लिया ।
उदयपुर में चर्चा का प्रवाह बहुत जोर से चल रहा था । श्री जी की चर्चा के दौरान सुन्दरसाथ को श्री राज के दर्शन होते थे । इस प्रकार, तारतम ज्ञान का बहुत प्रकाश फैलने लगा ।
श्री जी के ज्ञान से प्रभावित होकर आहेड़ के कुछ लोग सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । उनमें एक मोटी बाई थीं, जो श्री जी को साक्षात् श्री राज का स्वरूप मानकर सदैव हंसी-मजाक किया करती थीं । श्री जी को हंसाकर उन्हें खुशी मिलती थी ।
अगला प्रसंग- दिल्ली से मोमिन वापस लौटे
