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उदयपुर पर औरंगज़ेब का आक्रमण

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०४

कुछ दिन ताल पर रहने के बाद श्री जी साहिब जी पुनः उदयपुर की हवेली में लौट आए । उनसे मिलकर सुन्दरसाथ को बहुत सुख मिला । तभी सूरत से गोवर्धन भट्ट अपने साथ धोली बाई को लेकर आए । उन दोनों ने श्री जी के चरणों में प्रणाम किया और सब सुन्दरसाथ से भेंट की ।

इस समय अजमेर से बादशाह औरंगज़ेब ने मथुरिया नामक दूत को सन्देश देकर राणा के पास भेजा । मथुरिया ने गरीब दास पुरोहित को सन्देशवाहक बनाकर भेजा । गरीब दास पुरोहित ने राणा को सन्देश सुनाया- "यदि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो, तो मैं तुम्हें पांच परगने दूंगा ।"

यह सुनते ही राणा को क्रोध आ गया और वह बोला- "ऐसी बात कहने वाले को मैं जीवित नहीं छोड़ता, परन्तु तू तो पुरोहित है । अब यहां से भाग जा ।"

राणा ने उस दूत को धक्के देकर वहां से निकलवा दिया, जिससे उसके अहं को बहुत ठेस पहुंची । औरंगज़ेब का दूत तो लौट गया, परन्तु उदयपुर में हलचल मच गई । इस समय दज्जाल ने बहुत शोर किया ।

तब श्री जी साहिब जी ने राणा को सन्देश भेजा- "कयामत का समय निकट आ चुका है । हम औरंगज़ेब की सेना से बात करेंगे । आप कुछ मत बोलना, हम सब कुछ सम्भाल लेंगे । धर्म की बात करके हम उसे हुक्म तले ले आएंगे ।"

राणा ने उत्तर दिया- "हम ऐसे पात्र नहीं हैं कि धार्मिक वार्ता कर सकें या इतनी बड़ी सेना का बोझ उठा सकें । यह हमसे नहीं हो पाएगा ।"

तब दज्जाल रूपी पण्डित राणा के सामने ही बैठे थे, सो वे श्री जी की जोर से निंदा करने लगे कि हमने तो पहले ही कहा था कि इन वैरागियों को राज्य से निकाल देना चाहिए । कोई कहने लगा कि इन्हें लूट लेना चाहिए । राणा ने सबकी बात सुनी, परन्तु कोई आदेश नहीं दिया ।

राणा भीमसेन पास में ही बैठे थे और सब बातें सुन रहे थे । उन्होंने सुझाव दिया कि यदि अपने राज्य में वैरागियों को लूटोगे, तो हमारी बदनामी हो जाएगी ।

तब राणा राज सिंह ने कोतवाल को श्री जी के पास यह सन्देश देकर भेजा- "आप सब साधुजन चार दिन के लिए राज्य से बाहर चले जाइए । जब यहां सुख-शान्ति हो जाएगी, तब वापस आ जाना ।"

औरंगज़ेब की सेना ने उदयपुर को चारों तरफ से ऐसे घेर रखा था कि कोई भी वहां से निकलकर बाहर न भाग सके ।

श्री जी साहिब जी ने मन में विचार किया- "शायद यह अक्षरातीत श्री राज की आज्ञा है कि यहां से चले जाओ ।"

श्री जी के पास जो वस्त्र आदि सामान था, उसे साथ लेकर चलना सम्भव नहीं था, सो उन्होंने उसे वहीं बांट देना उचित समझा ।

कोतवाल दूसरी बार राणा का हुक्म लेकर आया- "आप लोग यहां से चले जाइए ।"

श्री जी ने सोचा- "अब यहां रहना धर्मानुसार उचित नहीं है । हमारा निर्णय तो धाम धनी के हाथ में है । वही हमें इस स्थान से छुड़ाकर ले जा रहे हैं । वे जहां ले जाएंगे, वहां हम जाएंगे । अब कोई अन्य स्थान ढूंढना पड़ेगा ।"

इस समय श्री जी का दर्शन करने महासिंह आए । श्री जी ने उन्हें नये वस्त्र पहनाकर उनका सत्कार किया और कहा- "अब आप सावधान हो जाइए । हम तो आपके राज्य से विदा हो रहे हैं, परन्तु आपके लिए भी यह स्थान वीरान हो जाएगा ।"

श्री जी ने अपने से जुड़े सभी अधिकारियों और सुन्दरसाथ को नये वस्त्र भिजवा दिए, तथा अपने साथ चल रहे सुन्दरसाथ को निर्गुण वस्त्र धारण करने का निर्देश दिया । सभी सुन्दरसाथ ने सगुण वस्त्र त्यागकर चीरक वस्त्र धारण किए और हाथ में तूंबा (पेठे से बना बर्तन), कूबड़ी (छड़ी) व गोदड़ी (कई टुकड़ों को जोड़कर बनी ओढ़नी) लेकर चलने के लिए तैयार हो गए ।

उदयपुर में सैंकड़ों लोग सुन्दरसाथ में शामिल हुए थे और उन्होंने अपनी आत्मा को श्री जी के चरणों में समर्पित कर दिया था । उनके नाम कहां तक लिखें ।

जब सुल्तान ने उदयपुर पर चढ़ाई की, तब सभी लोग वहां से निकलकर भागने लगे । उसी समय श्री जी सहित सुन्दरसाथ ने भी उस नगर का त्याग कर दिया ।

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