श्री जी का मन्दसौर आगमन
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०७
जब वि.सं. १७३६ बीत गया और वि.सं. १७३७ शुरु हुआ, तब श्री जी साहिब जी सब सुन्दरसाथ सहित मन्दसौर पहुंचे और हरिप्रसाद के घर पर ठहरे ।
मन्दसौर के चारों तरफ औरंगज़ेब की शाही सेना ने डेरा डाल रखा था । सुन्दरसाथ वहां बैठकर सनन्धें गाने लगे, तो कोई-कोई सैनिक उसे सुनने के लिए आ जाते थे ।
जब दौलत खान पठान सनन्ध सुनने आया, तो उसके मन को चोट पहुंची और वह श्री जी पर ईमान ले आया । शेरखान कोटी और उसके साथी पठान भी सनन्ध सुनकर ईमान ले आए । तभी सुन्दरसाथ ने "बिना एक महम्मद की" सनन्ध पढ़ी, जिसे सुनकर दौलत खान पठान को जोश आ गया । दौलत खान के मुख से लगातार "बिना एक मुहम्मद, बिना एक मुहम्मद" निकलने लगा ।
यहां श्री जी के पास कृपाराम एक पाती लेकर आए, जिसमें उदयपुर के साथ ने युद्ध के कारण होने वाले कष्टों का वर्णन किया था । उदयपुर के सुन्दरसाथ पहाड़ों पर छिपकर विलाप कर रहे थे ।
यह सब जानकर महामति जी को बहुत दुःख हुआ । तब उन्होंने मूल स्वरूप श्री राज का ध्यान करके साथ को कष्टों से मुक्त करने की पुकार की । उस अवस्था में उन्हें विरह के छह किरन्तन उतरे, जिनकी पहली चौपाई है- "वालो विरह रस भीनों रंग विरहमां रमाड़तो, वासना रुदन करे जल धार ।"
महामति जी की प्रार्थना स्वीकार करते हुए श्री राज ने सुन्दरसाथ पर मेहेर करी ।
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