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राजा भाव सिंह से मुकुन्द दास की भेंट

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १०९

श्री जी ने मुकुन्द दास, केशव दास, खिमाई भाई और वल्लभ को औरंगाबाद के राजा भाव सिंह को जाग्रत करने के लिए भेजा था ।

वहां जाकर केशव दास और वल्लभ एक दुकान में बैठने लगे, परन्तु मुकुन्द दास और खिमाई भाई ने वैरागी भेष का त्याग नहीं किया । वे कई महीनों तक वेदान्त के गूढ़ रहस्यों की खोज करते रहे । राजा से मिलने का उन्होंने बहुत प्रयास किया, परन्तु सफलता नहीं मिली । अब उन्होंने मन में विचार किया कि असफलता लेकर वापस कैसे जाएं ?

तब मुकुन्द दास और खिमाई भाई ने भिक्षा मांगकर रेशमी वस्त्र खरीदा । उस वस्त्र से थैली बनाकर उसमें प्रसाद के साथ भागवत-वेदान्त के कुछ प्रश्न लिखकर रख दिए और राजा से मिलने का प्रयास किया ।

महन्त राम दास ने मुकुन्द दास जी को बीच बाजार में ही देख लिया और पीटते-पीटते नाले पार पहुंचा दिया ।

तद्पश्चात् वह धमकी देते हुए बोला- "यदि तू औरंगाबाद में रहेगा या भाव सिंह को भटकाने की कोशिश करेगा, तो हम तुम्हें दोबारा मारेंगे ।"

तब मुकुन्द दास ने विचार किया- "यह दज्जाल तो मुझे सीधे तरीके से राजा से मिलने नहीं देगा । राजा भाव सिंह देवी के मन्दिर में दर्शन करने जाता है । यदि मैं वहां बैठ जाऊं, तो अपने हाथ से उसे वहां पाती दे सकता हूं ।"

मुकुन्द दास ने अपनी योजनानुसार कार्य किया और मन्दिर में राजा भाव सिंह को प्रसाद व प्रश्नों वाली थैली दे दी । राजा ने उस थैली को माथे से लगाकर स्वीकार कर लिया । फिर अपने महल के भीतर जाकर मुकुन्द दास को बुलवाया ।

राजा भाव सिंह ने मुकुन्द दास से पूछा- "स्वामी कृष्ण दास जी (श्री जी) कहां हैं ? उन्होंने आपको मेरे पास क्यों भेजा है ? आप क्या चाहते हैं ?"

फिर राजा पाती को पढ़ने लगा । उसमें भागवत और वेदान्त के प्रश्न लिखे थे । उस सभा में महन्त रामदास भी बैठा था ।

उसने मुकुन्द दास के प्रति ईर्ष्या के वचन कहे- "ये तो दो कृष्ण बताते हैं, जैसा शास्त्रों में कहीं नहीं है । इनसे बात क्या करना, इनका तो मुख भी नहीं देखना चाहिए ।"

तब राजा भाव सिंह बोला- "तुम ऐसा क्यों कहते हो ? यह तो हमारे निज स्वरूप की बात बताते हैं ।"

भाव सिंह समझ गया कि महन्त रामदास इनसे द्वेष रखता है, इसी लिए इतना शोर कर रहा है । उसने आदेश दिया- "हमारी हवेली के पास मुकुन्द दास जी के रहने की व्यवस्था की जाए ।"

तब रामदास बोला- "महाराज ! मैं अपने घर ले जाकर इनकी सेवा करना चाहता हूं ।"

मुकुन्द दास ने तुरन्त कहा- "इन्होंने पहले ही मेरी बहुत सेवा की है ।"

यह कहकर मुकुन्द दास ने वस्त्र हटाकर अपनी पीठ दिखाई । उनकी पीठ के घावों को देखकर भाव सिंह बहुत दुःखी हुआ और महन्त रामदास को गाली देते हुए धक्का देकर निकाल दिया ।

फिर राजा ने अपने पण्डितों से कहा- "मुझे इन प्रश्नों का उत्तर चाहिए, जिससे मेरे हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो ।"

उन पण्डितों को उत्तर तो आता नहीं था, सो वे निन्दा करने लगे । भाव सिंह उनकी मनोदशा समझ गया ।

तब मुकुन्द दास ने कहा- "सभी पण्डित मुझसे प्रश्न पूछ सकते हैं, मैं उनका सन्तोषजनक उत्तर दूंगा । और मैं इनसे जो प्रश्न पूछूं, उनका उत्तर इन्हें देना होगा । दोनों में जो हारे, उसके गले में जूतों की माला डालकर नगर में घुमाया जाए ।"

पण्डितों ने ८० प्रश्न लिखे और मुकुन्द दास ने २३ प्रश्न लिखे । दोनों पक्षों को उत्तर देने के लिए १५ दिन का पर्याप्त समय दिया गया । पण्डितों को प्रतिदिन जो दस-बीस रुपये दक्षिणा के रूप में मिलते थे, वह भी उत्तर आने तक रोक दिए गए ।

मुकुन्द दास ने उसी दिन सभी प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर लिखकर राजा को सौंप दिया । पण्डितों को उत्तर आया नहीं, तो वे रात्रि के अन्धकार में मुकुन्द दास से मिलने आए ।

पण्डितों ने मुकुन्द दास से कहा- "हम भूखे मर रहे हैं । यदि आपके स्वामी जी ने यही सिखाया है कि पण्डितों की रोटी छीन लो, तो हम ऐसे ही सन्तोष कर लेंगे । नहीं तो हमें इस संकट से बचाओ, हम दस बार हार मानते हैं ।"

तब मुकुन्द दास ने राजा भाव सिंह से कहा- "ये पण्डित इन प्रश्नों का उत्तर कैसे दे सकते हैं ? यह तो अखण्ड लीला की बात है, जहां तक इनका मन नहीं पहुंच सकता ।"

राजा ने आदेश दिया कि अब से पण्डितों को आधी दक्षिणा ही दी जाए । मुकुन्द दास ने उनका काम कर दिया था । फिर तीन दिन तक राजा भाव सिंह बहुत ध्यान से तारतम ज्ञान की चर्चा सुनता रहा और उसे श्री जी साहिब जी के स्वरूप की पहचान हो गई ।

राजा के कहने पर मुकुन्द दास ने श्री जी को आमन्त्रित करते हुए विस्तृत पाती लिखकर भेजी ।

अगला प्रसंग- श्री जी ने भिक्षा में मिला भोजन ग्रहण किया