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श्री जी ने भिक्षा में मिला भोजन ग्रहण किया

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११०

मन्दसौर में औरंगज़ेब के सैनिकों से बचने के लिए सुन्दरसाथ बिखर गए और अलग-अलग रहने लगे, परन्तु किसी का चित्त दुःखी नहीं हुआ । सब छिप-छिप कर रहते और दिन में एक बार श्री जी का दर्शन करने के लिए आते । अपने साथ भिक्षा में प्राप्त हुए टुकड़े (भिन्न-भिन्न वस्तुएं) झोली में भरकर लाते ।

श्री जी बड़े प्रेम से भिक्षा में मिले भोजन को ग्रहण करते । साथ में वे हंसते हुए पूछते कि यह टुकड़ा किसकी झोली का है ? तब कोई सुन्दरसाथ खुश होकर उत्तर देता कि इसे वह लाया है । श्री जी उस पर बहुत प्रसन्न होते और हंस-हंस कर बातें करते । इस प्रकार की लीला करके श्री राज सब सुन्दरसाथ की परीक्षा ले रहे थे कि उनके अन्दर कोई अहं तो शेष नहीं है ।

यह कितनी विचित्र लीला है कि समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी अक्षरातीत परब्रह्म अपनी आत्माओं के प्रेम में डूबकर भिक्षा में मिला भोजन ग्रहण करके गुजारा करते हैं ।

उस समय मोमिन बहुत खुश होकर बातें करते कि ऐसा दिन हमें फिर कहां देखने को मिलेगा, जब हम एक-दूसरे के साथ हिल-मिलकर रहें । तब श्री जी कहते कि आपने अपने परिवार को त्यागकर माया का सिर कुचला है । मोमिनों के मुख पर ऐसा तेज होता था, जैसे कि धनी का जोश जिब्रील विशेष तौर पर उनके साथ हो ।

इस समय श्री बाई जी प्रसन्न चित्त से मोमिनों की सेवा करती हैं और उनको प्रेम भाव से भोजन परोसती हैं । फिर सुन्दरसाथ प्रेम से एक-दूसरे को भोजन कराते हैं और किसी के मन में कोई द्वेष नहीं है ।

तभी श्री जी साहिब जी को मुकुन्द दास की एक लम्बी पाती मिली, जिसमें उन्होंने राजा भाव सिंह की तरफ से श्री जी को औरंगाबाद आमन्त्रित किया था । उस पाती में विस्तार से तरह-तरह की बातें लिखी थीं, जिसे पढ़कर श्री जी और सब सुन्दरसाथ बहुत प्रसन्न हुए ।

सब सुन्दरसाथ को सूचना दे दी गई कि अब यहां से प्रयाण करना है । मन्दसौर में आठ महीने रहने के बाद श्री राज ने वहां से चलने का हुक्म दे दिया था । अतः सब सुन्दरसाथ एकत्रित होकर चलने के लिए तैयार हो गए ।

उधर औरंगाबाद में राजा भाव सिंह श्री जी से मिलने के लिए व्याकुल होने लगा ।

राजा भाव सिंह ने मुकुन्द दास से कहा- "आप स्वयं श्री जी साहिब जी को यहां ले आइए । आप यहां से घोड़ा लेकर जाइए और बूंदी में आपको हथिनी भी मिल जाएगी । मैं बूंदी में एक हवेली लिख देता हूं, उसमें श्री बाई जी को ठहरा देना ।"

मुकुन्द दास घोड़े की सवारी और मार्ग के खर्च के लिए धन लेकर मन्दसौर पहुंच गए ।

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