उज्जैन की बीतक
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १११
जब मन्दसौर में मुकुन्द दास आकर श्री जी से मिले, तब सबने वहां से प्रस्थान किया । वहां से सीतामऊ और नोलाई होते हुए श्री जी साहिब जी व सब सुन्दरसाथ २८ दिन बाद उज्जैन पहुंचे ।
भादो मास की षष्ठी को धनबाई के घर पधारे । भाई भगवान चौधरी श्री जी पर ईमान ले आए ।
फिर बाबू जी ने अपने घर पर सब सुन्दरसाथ का उत्सव किया (भोजन कराया) । उसके पुत्र का नाम नानजी था । श्री जी उसके घर की दूसरी मंजिल पर ठहरे ।
भगवान भाई का पुत्र बूला, मन भाई का पुत्र कानजी, धनबाई का पुत्र दामोदर दास श्री जी पर ईमान ले आए । यहां पर लालजी, उनका पुत्र बूला, कानजी (दूसरा) और बेनी भाई श्री जी के चरणों में आए ।
लालजी ने अपने घर पर श्री जी को पधराया और सुन्दरसाथ का उत्सव किया ।
मोहन भाई ने अपने घर उत्सव किया और अपने सभी मनोरथ पूर्ण कर लिए ।
श्री राम और धनजी भी सुन्दरसाथ में शामिल हो गए । फिर श्री जी उनके घर पधारे और उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर दिया ।
कानजी ने अपने घर पर श्री जी एवं सब सुन्दरसाथ को रसोई दी । उसने हाव-भाव तो बहुत किया, परन्तु परमधाम के अंकुर के बिना कोई मोमिन नहीं बन सकता ।
श्री जी साहिब जी जीवली, ऊका और धनजी के घर भी पधारे और उन सबने भली-भांति से रसोई करके श्री जी को रिझाया ।
बाल बाई ने श्री जी को अपने घर पधराकर भोजन कराया । श्री जी का दर्शन करके उसे बहुत हर्ष हुआ ।
भूदर बाई, फूल बाई, राम बाई ने भी श्री जी को सुन्दरसाथ सहित अपने घर पधराया और अपने मनोरथ पूर्ण किए ।
मुरली, आनन्द और श्याम ने श्री जी को कानजी के घर आमन्त्रित किया और प्रेम से पधराया । इसके पश्चात् मोहन के घर भी पधारे ।
इस प्रकार अनेक नए-नए साहूकारों ने श्री जी और सब सुन्दरसाथ को अपने घर श्रद्धा भाव से पधराया, भोजन कराया, और उचित सत्कार किया ।
२२ दिन उज्जैन में रहने के पश्चात् श्री जी सहित सब सुन्दरसाथ नुनेरे पहुंचे और एक दिन रहे । फिर बुढ़ानपुर पहुंचे और एक दिन वहां रहे । इसके बाद औरंगाबाद में राजा भाव सिंह की हवेली पर उतरे ।
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