औरंगाबाद वृत्तान्त
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ११२
जब श्री जी साहिब जी औरंगाबाद पहुंचे, तो उनका दर्शन पाकर राजा भाव सिंह ने स्वयं को धन्य-धन्य माना और उनके दोनों चरण पकड़कर अभिवादन किया ।
राजा भाव सिंह ने श्री जी एवं सब सुन्दरसाथ को भोजन कराया और अपनी हवेली में उनके रहने की व्यवस्था की । उसने श्रद्धापूर्वक सबकी बहुत सेवा की ।
जब सुन्दरसाथ नरसैयां के प्रेम भरे कीर्तन गा रहे थे, तो उसे सुनकर भाव सिंह इतना मग्न हो गया कि सारी मर्यादा छोड़कर वह सुन्दरसाथ के साथ नाचने लगा । भाव सिंह में भक्ति भाव की प्रधानता थी । वह श्री जी को परमेश्वर मानकर सच्चे हृदय से सेवा करता था । उसके मन में कोई संशय नहीं था । रास लीला के कीर्तन सुनकर वह बहुत प्रसन्न हो जाता था ।
इस समय भवानी भट्ट आकर श्री जी से मिले । वे पहले भी श्री जी से उदयपुर में मिल चुके थे । उन पर देवी भवानी बहुत प्रसन्न थीं । वे दक्षिण से "बुद्ध गीता एवं बुद्ध स्तोत्र" लेकर आए थे । श्री जी का दर्शन करके उन्हें बहुत सुख हुआ । वे प्रतिदिन चर्चा में बुद्ध गीता एवं बुद्ध स्तोत्र का पाठ करने और श्री जी का दर्शन करने आते थे । श्री जी की कृपा से उन्हें तारतम ज्ञान की कुछ पहचान हो गई ।
औरंगाबाद में श्री जी की दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी ।भवानी भट्ट मध्यान्ह १०:३० बजे तक बुद्ध गीता एवं बुद्ध स्त्रोत की कथा सुनाते हैं । उसके पश्चात् श्री जी भोजन करके सो जाते हैं । सायं लगभग ३:३० पर श्री जी निद्रा से उठते हैं । फिर चर्चा होती है । संध्या में सब सुन्दरसाथ श्री जी को परब्रह्म का स्वरूप मानकर उनकी आरती उतारते हैं ।
रात्रि में श्री जी की जोरदार चर्चा होती है । एक तरफ लालदास कुरान लेकर बैठते हैं, तो दूसरी तरफ भवानी भट्ट भागवत लेकर बैठते हैं । श्री जी दोनों के ज्ञान को मिलाकर सब रहस्यों को खोलते हैं । चर्चा सुनने वाले सुन्दरसाथ में से कोई बीच में प्रश्न करते हैं, तो कोई अपने हाथों में वाणी (श्री कुलजम सरूप) लेकर बैठते हैं ।
इस प्रकार रात्रि की चर्चा प्रातः साढ़े चार बजे तक चलती है । उसके बाद श्री जी हिंडोले (झूले) वाले पलंग पर लेटते हैं और सुन्दरसाथ रास की रामते गाते हैं । गाते-गाते सूर्योदय हो जाता है । इस प्रकार की लीला करते हुए चार मास बीत गए । नित्य चर्चा, कीर्तन और उत्सव होता, जिससे साथ को बहुत आनन्द मिलता था ।
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